मुकदमेबाजी भारत के अति प्रचलित शब्दों में एक है। तमाम वर्गों के लोगों द्वारा किसी न किसी रूप में इस शब्द का प्रयोग होता है। कही धमकी तो कहीं सलाह तो कहीं अस्त्र के रूपों में इसका इस्तेमाल होते हुए देखा जाता है। यह शब्द आतंकित करता है तो आश्वस्ति भी देता है। इसका आतंक यह होता है कि कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ेंगे, वकील एवं अन्य लोगों को पैसे देने पड़ेंगे, फिर पता नहीं फैसला माफिक आयेगा भी नहीं। इसलिये आम-साधारण लोग इससे यथा सम्भव बचने की कोशिश करते हैं।
दूसरी ओर एक वर्ग वह है जो अपनी मनमानी को अमल में लाने के लिये मुकदमे को एक सटीक हथियार के रूप में देखता है। एक वर्ग और है जो थोड़ा और आगे बढ़कर मुकदमे को जहां तक हो सके, लम्बा चलाने के रणनीति के साथ मैदान में आता है। उसका मानना होता है कि किसी न किसी बहाने सुनवाई टलते रहने से उसका दोष सिद्ध नहीं हो सकेगा और वह सजा से बच सकेगा। इस बात को कोर्ट भी समझता है लेकिन जिन प्रावधानों का गलत फायदा उठाया जाता है, उन्हीं प्रावधानों से उसके हाथ भी बंधे होते हैं।

निर्भया बलात्कार कांड में दोषियों की ओर से लगातार कानूनी दांवपेंच सभी लोग देख रहे हैं और उसपर ताज्जुब भी कर रहे हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के सामने एक और मामला आया जो यपी में अमरोहा जिले के एक गांव का है जहा एक युवती ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने परिवार के सात लोगों की हत्या कर दी थी। उसकी सजा पर पुनर्विचार याचिका कोर्ट में दायर की गई है जिसपर कोर्ट को साफ कहना पड़ा कि कानून के नाम पर अंतहीन मुकदमेबाजी सही नहीं है। इस तरह से तो फैसला हो ही नहीं पाएगा। दांवपेंच इसी तरह खेले जाते हैं।
प्रावधान तो इसलिए किए गए कि किसी के साथ नाइंसाफी नहीं होने पाये, भले ही वह दोषी ही क्यों न हो। ऐसा न हो कि उसको बिना आधार-औचित्य के मृत्यु दण्ड दे दिया जाय। शातिर दिमाग लोग अपना हक मानते हुए इन प्रावधानों को आजमाते रहते हैं कि शायद तुक्का लग जाए। उनका यह खेल मुकदमे को अंतहीन रास्ते पर ले जाता है और प्रकारान्तर से कानूनी प्रक्रिया को एक मजाक में तब्दील कर देता है।
इसी तरह भ्रष्टाचार के तमाम मामलों में भी देखा जाता है कि कानूनी प्रक्रिया को लम्बा खींचने का उपक्रम किया जा रहा है। यहां तो भ्रष्टाचार यह सोचकर ही किया जाता है कि ज्यादा से ज्यादा मुकदमा ही तो चलेगा। तो उसे देख दिया जाएगा। इसीलिये केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से यह व्यवस्था करने का अनुरोध किया है मृत्यु दण्ड की सजा देने के बाद दया याचिका के लिए सात दिन दिए जाएं। कानून के इस तरह दुरुपयोग की घटनाएं बढ़ रही हैं जिनपर गम्भीरता से विचार होना चाहिये।






