भाषा का घालमेल हिंदी फिल्मों में !

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भारत में कई भाषाओं में फ़िल्में बनती हैं। मुंबई की फ़िल्मी दुनिया हिंदी फिल्मों के लिए जानी जाती है, जबकि दक्षिण में तीन भाषाओं में फिल्म बनती है! बांग्ला, भोजपुरी और उड़िया के अलावा कुछ और भाषाओं में भी फ़िल्में बनाई और देखी जाती है! लेकिन, सबसे ज्यादा असरदार है, हिंदी सिनेमा! कहने को इन फिल्मों की भाषा हिंदी है, पर इसमें कई भाषाओं और बोलियों का घालमेल है! शुरूआती समय में तो हिंदी सिनेमा में उर्दू का तड़का लगता था! किंतु, समय के साथ-साथ ये रिश्ता दरकने लगा! सिर्फ भाषा के इस्तेमाल में ही बदलाव नहीं आया, बोलने का लहजा भी बदल गया। इस बात से इंकार नहीं कि समाज ही सिनेमा को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, पर भाषा ही वो घटक है, जो फ़िल्म का संस्कार दर्शाता है।
  50 और 60 के दशक के मध्यकाल तक फिल्मों में जुबान स्पष्ट और आसान थी। जबकि, अब आज की फिल्मों में इंग्लिश शब्दों के प्रयोग के साथ-साथ स्थानीय बोली का भी घालमेल ज्यादा दिखने लगा है। अपराध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘गैंग आफ वासेपुर’ को भाषा के स्तर पर फिल्मों में आने वाले बदलाव का मोड़ कहा जा सकता है। इस फिल्म में भाषा का विकृततम रूप सुनाई दिया था। अब तो स्थिति ये आ गई कि फिल्मों की भाषा को किरदार मुताबिक गढ़ा जाने लगा है! ‘तनु वेड्स मनु’ में कंगना रनौत अपना परिचय हरियाणवी में देती है। ‘बाजीराव मस्तानी’ में मराठा बना रणवीर सिंह मराठी बोलता नजर आता है! ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में भोजपुरी, ‘उड़ता पंजाब’ में पंजाबी, ‘पानसिंह तोमर’ में ब्रज भाषा का इस्तेमाल हुआ! वास्तव में तो फिल्मों की भाषा दर्शक की मनःस्थिति तक पहुँचने का जरिया होती है! यही कारण है कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल होता है, जो लोगों में लोकप्रिय हो और आसानी से समझ आए।
हिंदी सिनेमा की भाषा की बात की जाए तो ये न तो व्याकरण सम्मत है न साहित्यिक! कहने को इन्हें हिंदी फ़िल्में कहा जाता हो, पर वास्तव में ये खरी हिंदी नहीं है, बल्कि कई भाषा और बोलियों का मिश्रण है! जबकि, देखा जाए तो मराठी, मलयालम, तमिल और यहाँ तक कि भोजपुरी और बांग्ला फिल्मों में भी वहाँ की अपनी भाषा होती है! पर, हिंदी फिल्मों में पूरी तरह हिंदी भाषा नहीं होती! फिल्म के संवादों में भाषा की इतनी मिलावट है, कि इसे हिंदी फ़िल्में तो कहा ही नहीं जा सकता! इसमें क्षेत्रीय बोलियों के साथ अंग्रेजी का भी भरपूर इस्तेमाल होता है। फिल्मों में भाषा का जो बदलता स्वरुप सामने आ रहा है, वो काफी हद तक हमारे समाज और संस्कृति का मापदंड है। देखा जाए तो समय के साथ बोलचाल की भाषा में भी बदलाव आ रहा है। ऐसे में सबसे सही भाषा वही मानी गई है, जो अपनी बात कहने का जरिया बने! कहने को एक फिल्म ‘हिंदी मीडियम’ भी बनी, पर ये भी हिंदी के लिए नहीं थी!
   दादासाहेब फाल्के ने जब 1913 में सबसे पहले बिना आवाज वाली फिल्म ‘राजा हरिशचंद्र’ बनाई थी, तब फिल्म की भाषा कोई विषय नहीं था! लेकिन, उसके बाद 1931 में जब पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ बनी, तो भाषा भी एक मुद्दा बन गया! लेकिन, तब हिंदी के साथ उर्दू की नफासत का पुट था, जो धीरे-धीरे लोप होता गया। 1940 में महबूब ख़ान ने ‘औरत’ बनाई थी, जो एक महिला के संघर्ष की कहानी थी। इसके बाद महबूब ख़ान ने एक ग्रामीण महिला के संघर्ष को ग्रामीण परिवेश में दिखाते हुए ‘मदर इंडिया’ बनाई! इस फिल्म की भाषा भोजपुरी मिश्रित हिन्दी थी। ग्रामीण परिवेश की कहानी वाली फिल्मों में हिन्दी और भोजपुरी का ही ज्यादा प्रयोग होता था। क्योंकि, मुंबई तथा अन्य बड़े शहरों में बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से गए लोगों की संख्या ज्यादा थी, जो भोजपुरी बोलते थे। खेती छोड़कर मज़दूरी करने आए मजदूर की जिंदगी पर बिमल राय ने ‘दो बीघा जमीन’ जैसी फिल्म बनाई थी। इसमें बलराज साहनी ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। इस फिल्म की भाषा तो हिन्दी थी, पर अनेक गाने भोजपुरी भाषा से जुड़े थे।
ये मुद्दा भी बहस का विषय रहा कि भाषाई संस्कार में आए बदलाव से हिंदी को नुकसान हुआ या कोई फायदा भी हुआ? इस मुद्दे पर सभी एकमत नहीं हो सकते! इसलिए कि सभी के तर्क अलग-अलग हो सकते हैं! ये भी कहा जा सकता है कि हिंदी फिल्मों में क्षेत्रीय भाषा के प्रभाव से हिंदी का स्तर गिरा नहीं है! बल्कि, इस रास्ते से हिंदी क्षेत्रीय भाषा एक बड़े समूह तक जरूर पहुंची है! ये ज़रूर है कि आज बॉलीवुड में ज्यादातर फिल्मों में खिचड़ी भाषा का इस्तेमाल होने लगा है। इसमें अंग्रेजी, हिंगलिश सबकुछ होता है। ये भी कहा जाता है कि क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल से हिंदी खराब नहीं हो रही, बल्कि समृद्ध हो रही है। साथ ही क्षेत्रीय भाषाएं और बोलियां भी संरक्षण पा रही है। लेकिन, फिर भी बॉलीवुड की फिल्मों को हिंदी फ़िल्में ही कहा जाता है और कहा जाता रहेगा।
हेमंत पाल के ब्लॉग से साभार 

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