जी के चक्रवर्ती
हमारे देश मे अनेक तरह के विकास कार्यों के चलते अब हरे-भरे पौधे और वृक्ष लुप्तप्राय: होते चले जा रहे हैं। UNEP (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण संबंधी गतिविधियों पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसकी स्थापना वर्ष 1972 के जून माह में संयुक्त राष्ट्र मानव पर्यावरण सम्मेलन के परिणामस्वरूप की गई थी जिसका मुख्यालय “नैरोबी” में स्थित है। इसके साथ ही इसके छः अन्य देशों में भी क्षेत्रीय कार्यालय हैं।) द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट यह दर्शाती है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हमारी धरती की भूमि पर लगभग 7.0 अरब हेक्टेयर क्षेत्र वन से आच्छादित हुआ करते थे वहीं वर्ष 1950 के आते-आते यह वन क्षेत्र घटकर 4.8 अरब रह गये।अब मौजूदा समय के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि वन सम्पूर्ण पृथिवी पर वन क्षेत्र घटकर 2.35 अरब हो गये हैं। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि सम्पूर्ण दुनिया से प्रतिवर्ष 7.3 मिलियन हेक्टेयर उष्णकटिबंधीय वन एवं प्रतिमिनट 14 हेक्टेयर नियंत्रित वन समाप्त होते चले जा रहे हैं।

यह अलग बात है कि कई एक सरकारी एजेंसिया एवं Ngo द्वारा उनके अपने-अपने स्तर पर प्रकृति को बचाने के उद्देश्य से पेड़-पौधे को लगाने को लेकर संघर्ष करती दिखाई देती हैं लेकिन इस तरह के छोटे-मोटे प्रयासों से इस समस्या से निपटा नही जा सकता हैं, कभी-कभी तो इसमे लगने वाले श्रम- धन इतना अत्यधिक होता है कि उसमें परिस्थिजनक संतुलन बनाए रखने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है ऐसी स्थिति को देखते हुए अब हमें देश के प्रत्येक जनसाधारण को इस बात के लिए जगरुख करना नितान्त आवश्यक हो गया है कि हरे-भरे पेड़ों को काटना बंद करें, अन्यथा उन्हें जुर्माना भी भरना पड़ सकता है भले ही यह जुर्माना सरकार के स्तर पर होगा लेकिन यदि प्रकृतिक स्तर हमें यह जुर्माना चुकाना पड़े शायद यह बहुत ही विकट होगा उससे बेहतर यही होगा कि हम जन-जन को अपने क्षेत्र में कम से कम एक पौधा रोपीत करने के लिए प्रेरित करें। हां यह बात अवश्य है कि इतने बड़े पैमाने पर किया जाने वाला पौधारोपण अत्यंत ही खर्चीला एवं श्रम पूर्ण कार्य है। उदाहरण स्वरूप यदि हम देश के केवल एक राज्य मध्यप्रदेश की ही बात करें कई मीडिया रिपोर्ट में ऐसा दावा किया गया है कि वहां पर पिछले पांच वर्षों में 40 करोड़ से ज्यादा पौधे लगाए गए हैं, लेकिन इनमें से आधे से अधिक पौधे वास्तव में नहीं बच पाये हैं।
हाँ इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि अब हम कुछ नहीं कर सकतें है वहीं पर यदि हम जनभागीदारी को बढ़ा कर परंपरागत तरीको से की जाने वाली खेती के साथ अत्याधुनिक तकनीको को अपना कर सूखे एवं बंजर इलाकों में भी हरितक्रांति को लाकर वहाँ के सूरते-हाल को बदलने में कामियाब हो सकते है।

आज के आधुनिकीकरण के दौर में होने वाले सतत बदलाव के साथ हमारे प्रकृति को बचाए रखने की नितान्त आवश्यकता है इसके लिए हमारे देश के प्रकृति प्रेमी लोगों द्वारा अपने आसपास के क्षत्र में हरियाली को बचाए-बनाए रखने के लिए कई तरह के उपाय को अपीनाने की आवश्यकता हैं। आज के आधुनिक समय में सीड बॉलिंग या सीड बॉमिंग भी एक ऐसा ही हरित क्रांतिकारी विचार है। यह बात सर्वथा अलग अवश्य है कि यह अभी तक मूलभूत रूप से एक जापानी विचार है लेकिन एक लम्बे अर्से से यह विचार सम्पूर्ण दुनिया में लोकप्रिय होता चला जा रहा है। यदि हम प्राचीन काल की ओर लौटें तो यह कह सकते हैं कि यह तरीका मिस्रवासियों ने भी अपने देश मे अपना कर खेती किया करते थे लेकिन एक वर्तमान समय एक जापानी किसान ने इसे लोकप्रियता के कगार पर ला खड़ा किया है क्योंकि उसने इसका उपयोग अपने खेतों की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता को बढ़ाने की तकनीक के रूप में प्रयोग कर अपने यहाँ खाद्यान्न पैदा किया है। सीड बॉलिंग या सीड बॉमिंग में खाद्यान्न के बीजों को क्ले मिटटी (तालाब/झील के तलछट की मिट्टी) या गोबर से 1/2 इंच से लेकर 1 इंच तक की गोल गोल गोलियां से सुरक्षित कर लिया जाता वहां पर इसे सीड बॉल कहते हैं।
दुनियां के अनेको देशों में कोयले को प्राकृतिक उर्वरक एवं मिट्टी की गेंद के रूप में प्रयोग किये जाने की परम्परा विकसित होती जा रही है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि हमारे देश मे भी कई समुदायों के लोग के मध्य एक लम्बे अर्से से जंगल उगाने एवं खेती बाड़ी करने के लिए इससे मिलती जुलती पद्धति अपनाते रहे हैं। इसमे सीड बॉल का उपयोग बिना जुताई और बिना जहरीले रसायनों के इस्तेमाल किये कुदरती खेती करने और मरुस्थलों को हरियाली में बदलने के लिए भी उपयोग में लाया जाता है। यह एक तरह की सर्वोत्तम खाद होती है। यह गोलीयां आम जंगली बीजों की ही तरह जमीन पर पड़ी रहती है बरसात या अनुकूल मौसम आने पर भूमि पर यह स्वतः पैदा हो जाती है।

मिट्टी की जैविकता बहुत तेजी से पनप कर नन्हे पौधों को पर्याप्त पोषक तत्व प्रदान कर फसल उत्पादन करती है। ठीक इसी तरह सीड बॉमिंग या एरियल रिफॉरेस्टेशन से पुनर्वनीकरण (Re-Forestation) एक ऐसी आधुनिक तकनीक है जिसमे हेलीकाप्टर के माध्यम से हजारों सीड बॉल्स को जंगलों या सीधी खड़ी ढ़लानों वाली बंजर जमीनों (जहां पर सफल होना मुश्किल होता है) पर बरसाया जाता है। इस प्रकार के तकनीक का प्रयोग पुनर्वनीकरण का प्रारंभिक दौर के एक रिकॉर्ड वर्ष1930 में मिलता है, उस वक्त होनोलुलु के जंगलों में आग लगने के कारण उसके पश्यचात दुर्गम पहाड़ों पर बीजों को फैला कर बोन के लिए इस तकनीक का उपयोग किया गया। इस तकनीक के सफल परीक्षण के पश्यचात दुनियां के कई अन्य देशों ने भी इसे अपने यहाँ अपनाकर खेती-बाड़ी का काम कर रहे हैं।
हमारे देश में प्राचीनकाल से ही वृक्षों को प्राकृतिक देवों के रूप में पूजा पाठ किये जाने की प्रथा विकसित है एवं अनेक प्राचीन ग्रंथो में भी इस बात का उल्लेख मिलता है इसतरह इसके महत्व को देखते हुये पूर्ण देव के रूप में भी महिमामंडित करते हुए यह कहा गया है कि वृक्षों के मूल में ब्रह्मा, छाल में विष्णु शाखाओं में शंकर तथा पत्ते-पत्ते पर सभी देवी- देवताओं का वास होता है। इसलिए हमें अपनी धरती के इस हरित श्रृंगार को बनाये रखने का संकल्प लेंकर कार्य करना चाहिए।
हमारी धरती हम पृथ्वी वासियों के माता के स्वरूप है क्योंकि यह हमें जीवनयापन करने के लिए आवश्यक संसाधनों को उपलब्ध करा कर हमारा पालन-पोषण करती है इसके लिए हमे पृथवी को सुरक्षित एवं हर-भरा बनाये रखने के लिए निरंतर प्रयास करते रहने की अत्यन्त आवश्यकता है।







