जहरीला होता जमीन का पानी

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पंकज चतुर्वेदी

जमीन की गहराईयों में पानी का अकूत भंडार है । यह पानी का सर्वसुलभ और स्वच्छ जरिया है, लेकिन यदि एक बार दूषित हो जाए तो इसका परिष्करण लगभग असंभव होता है । भारत में जनसंख्या बढ़ने के साथ घरेलू इस्तेमाल, खेती और औद्योगिक उपयोग के लिए भूगर्भ जल पर निर्भरता साल-दर-साल बढ़ती जा रही है । पाताल से पानी निचोड़ने की प्रक्रिया में सामाजिक व सरकारी कोताही के चलते भूजल खतरनाक स्तर तक जहरीला होता जा रहा है । भारत में दुनिया की सर्वाधिक खेती होती है । यहां 50 मिलियन हेक्टर से अधिक जमीन पर जुताई होती है, इस पर 460 बी.सी.एन. पानी खर्च होता है । खेतों की जरूरत का 41 फीसदी पानी सतही स्त्रोतों से व 51 प्रतिशत भूगर्भ से मिलता है । गत् 50 सालों के दौरान भूजल के इस्तेमाल में 115 गुणा का इजाफा हुआ है । भूजल के बेतहाशा इस्तेमाल से एक तो जल स्तर बेहद नीचे पहुँच गया है, वहीं लापरवाहियों के चलते प्रकृति की इस अनूठी सौगात जहरीली होती जा रही है ।

सनद रहे कि देश के 360 जिलों को भूजल स्तर में गिरावट के लिए खतरनाक स्तर पर चिन्हित किया गया है । भूजल रिचार्ज के लिए तो कई प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन खेती, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण जहर होते भूजल को ले कर लगभग निश्क्रियता का माहौल है । बारिश, झील व तालाब, नदियों और भूजल के बीच यांत्रिकी अंतर्संबंध है । जंगल और पेड़ रिचार्ज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । इसी प्रक्रिया में कई जहरीले रसायन जमीन के भीतर रिस जाते हैं । ऐसा ही दूषित पानी पीने के कारण देश के कई इलाकों में अपंगता, बहरापन, दांतों का खराब होना, त्वचा के रोग, पेट खराब होना आदि महामारी का रूप ले चुका है। ऐसे अधिकांश इलाके आदिवासी बाहुल्य हैं और वहां पीने के पानी के लिए भूजल के अलावा कोई विकल्प उपलब्ध नहीं हैं।

दुनिया में चमड़े के काम का 13 फीसदी भारत में और भारत के कुल चमड़ा उद्योग का 60 फीसदी तमिलनाडु में है। मद्रास के आसपास पलार और कुंडावानुर नदियों के किनारे चमड़े के परिष्करण की अनगिनत इकाईयां हैं। चमड़े की टैनिंग की प्रक्रिया से निकले रसायनों के कारण राज्य के आठ जिलों के भूजल में नाईट्रेट की मात्रा का आधिक्य पाया गया है। दांतों व हड्डियों का दुश्मन फलोराईड सात जिलों में निर्धारित सीमा से कहीं अधिक है। दो जिलों में आर्सेनिक की मात्रा भूजल में बेतहाशा पाई गई है ।

एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक आंध्रप्रदेश के 10 जिलों के भूजल में नाईट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम से भी अधिक फ्लोराईड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम के खतरनाक स्तर से अधिक पाई गई है। कर्नाटक में बंगलूरू और झीलों की नगरी कहलाने वाले धारवाड़ सहित 12 जिलों के भूजल में नाईट्रेट का स्तर 45 मिग्रा से अधिक है । सर्वाधिक साक्षर व जागरूक कहलाने वाले केरल का भूजल भी जहर होने से बच नहीं पाया है । यहां के पालघाट, मल्लापुरम, कोट्टायम सहित पांच जिले नाईट्रेट की अधिक मात्रा के शिकर हैं ।

पश्चिम बंगाल के नौ जिलों में नाईट्रेट और तीन जिलों में फ्लोराईड की अधिकता है। बर्धमान, 24 परगना, हावड़ा, हुगली सहित आठ जिलों में जहरीला आर्सेनिक पानी में बुरी तरह घुल चुका है । राज्य के 10 जिलों का भूजल भरी धातुओं के कारण बदरंग, बेस्वाद हो चुका है । ओडिशा के 14 जिलों में नाईट्रेट के आधिक्य के कारण पेट के रोगियों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है । जबकि बोलांगिर, खुर्दा और कालाहांडी जिलों फ्लोराईड के आधिक्य के कारण गांव-गांव में पैर टेढ़े होने का रोग फैल चुका है।

अहमदनगर से वर्धा तक लगभग आधे महाराश्ट्र के 23 जिलों के जमीन के भीतर के पानी में नाईट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम के स्तर से कहीं आगे जा चुकी है । इनमें मराठवाड़ा क्षेत्र के लगभग सभी तालुके शामिल हैं । भंडारा, चंद्रपुर, औरंगाबाद और नांदेड़ जिले के गांवों में हैंडपंप का पानी पीने वालों में दांत के रोगी बढ़ रहे हैं, क्योंकि इस पानी में फ्लोराईड की बेइंतिहरा मात्रा है । तेजी से हुए औद्योगिकीकरण व शहरीकरण का खामियाजा गुजरात के भूजल को चुकाना पड़ रहा है । यहां के आठ जिलों में नाईट्रेट और फ्लोराईड का स्तर जल को जहर बना रहा है ।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के बड़े हिस्से के भूजल में यूनियन कार्बाइड कारखाने के जहरीले रसायन घुल जाने का मुद्दा अंतरराश्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहा है । बावजूद इसके लोग हैंडपंपों का पानी पी रहे हैं और बीमार हो रहे हैं । राज्य के ग्वालियर सहित 13 जिलों के भूजल में नाईट्रेट का असर निर्धारित मात्रा से कई गुणा अधिक पाया गया है । फ्लोराईड के आधिक्य की मार झेल रहे जिलों की संख्या हर साल बढ़ रही है । इस समय ऐसे जिलों की संख्या नौ दर्ज है । नागदा, रतलात, रायसेन, शहडोल आदि जिलों में विभिन्न कारखानों से निकले अपषिस्ट के रसायन जमीन में कई कई किलोमीटर गहराई तक घर कर चुके हैं और इससे पानी अछूता नहीं है । उत्तर प्रदेश का भूजल पदिृश्य तो बेहद डरावना बन गया है । यहां लखनऊ, इलाहबाद, बनारस सहित 21 जिलों में फ्लोराईड का आधिक्य दर्ज किया गया है । जबकि बलिया का पानी आर्सेनिक की अधिकता से जहर हो चुका है । गाजियाबाद, कानपुर आदि औद्योगिक जिलों में नाईट्रेट व भारी धातुओं की मात्रा निर्धारित मापदंड से कहीं अधिक है।

देश की राजधानी दिल्ली, उससे सटे हरियाणा व पंजाब की जल कुंडली में जहरीले गृहों का बोलबाला है । यहां का भूजल खेतों में अंधाधुंध रासायनिक खादों के इस्तेमाल और कारखानों की गंदी निकासी के जमीन में रिसने से दूषित हुआ है। दिल्ली में नजफगढ् के आसपास के इलाके के भूजल को तो इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं करार दिया गया है। राजस्थान के कोई 20 हजार गांवेंा में जल की आपूर्ति का एकमात्र जरिया भूजल ही है और उसमें नाईट्रेट व फ्लोराईड की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई गई है। एक तरफ प्यास है तो दूसरी ओर जहरीला पानी। लोग ट्यूबवेल का पानी पी रहे हैं और बीमार हो रहे हैं ।

गौरतलब है कि खेती में रासायनिक खादों व दवाईयों के बढ़ते प्रचलन ने जमीन की नैसर्गिक क्षमता और उसकी परतों के नीचे मौजूद पानी को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है । उर्वरकों में मौजूद नाईट्रोजन, मिट्टी के अवयवों से मिल कर नाईट्रेट के रूप में परिवर्तित हो कर भूजल में घुल जाते हैं ।

दिल्ली सहित कुछ राज्यों में भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन भूजल को दूशित करने वालों पर अंकुश के कानून किताबों से बाहर नहीं आ पाए हैं । यह अंदेशा सभी को है कि आने वाले दशकों में पानी को ले कर सरकार और समाज को बेहद मशक्कत करनी होगी । ऐसे में प्रकृतिजन्य भूजल का जहर होना मानव जाति के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा सकता है ।

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