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    शिक्षा और वोटरशिप जैसे हथियार से बदला जा सकता है विश्व

    By October 24, 2019 Current Issues No Comments13 Mins Read
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    24 अक्टूबर: संयुक्त राष्ट्र संघ दिवस पर विशेष: मानव सभ्यता के इतिहास में 20वीं सदी सबसे बड़ी खूनी सदी रही है: डा. कौफी अन्नान

    प्रदीप कुमार सिंह

    अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री फ्रैन्कलिन रूजवेल्ट ने 1945 में विश्व के नेताओं की एक बैठक बुलाई जिसकी वजह से 24 अक्टूबर, 1945 को विश्व की शान्ति की सबसे बड़ी संस्था ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यू.एन.ओ.) की स्थापना हुई। प्रारम्भ में केवल 51 देशों ने ही संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किये थे। वर्तमान में 193 देश इसके पूर्ण सदस्य हैं व 2 देश इसके अवलोकन देश (ऑब्जर्बर) हैं। फ्रैंकलिन रूजवेल्ट की इस पहल के कारण पिछले 74 वर्षों से संसार में कोई और विश्व युद्ध अर्थात तीसरा विश्व युद्ध नहीं हुआ।

    संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य मानव जाति के कल्याण के लिए एक वैश्विक राजनैतिक तथा आर्थिक स्थिरता कायम करना, अन्तर्राष्ट्रीय शांति स्थापित करना, मानवाधिकारों की रक्षा, देशों के मध्य युद्धों को रोकना, एकता व शांति को बढ़ावा देना, पड़ोसी देशों के बीच अच्छे संबंध स्थापित करना है। वर्तमान में विभिन्न देशों में गरीबी, भुखमरी, बीमारी, शरणार्थी समस्या, मानव व ड्रग तस्करी को रोकना एवं अशिक्षा को दूर करने का दायित्व संयुक्त राष्ट्र संघ अपने सदस्य देशों के सहयोग से यथा शक्ति निभा रहा है।

    संयुक्त राष्ट्र संघ की वजह से ही विश्व के कई हिस्सों में आज शांति और एकता का वातावरण स्थापित है। इसके प्रमुख उद्देश्यों को संगठन के घोषणा पत्र में उल्लेखित किया गया है। यह घोषणा पत्र संगठन को किसी भी देश के घरेलू मामले में दखल देने की अनुमति प्रदान नहीं करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय ही पांच शक्तिशाली देशों अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन तथा फ्रान्स को दिये गये पांच वीटोपाॅवर इसके वैश्विक लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाये रखने में एक बड़ी बाधा है। इसलिए जितनी जल्दी हो सके पांच वीटोपाॅवर को संयुक्त राष्ट्र संघ से समाप्त किया जाना चाहिए। चीन ने वीटोपाॅवर की शक्ति का 3 बार प्रयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने में किया था। वीटोपाॅवर के मायने है कि यदि 192 देश (चार वीटोटोपाॅवर देश सहित) मिलकर कोई निर्णय करे और यदि वीटोपाॅवर से लेश मात्र एक देश भी उस पर वीटो कर दें तो 192 देशों द्वारा लिया गया वह निर्णय रद्द हो जायेगा। वीटोपाॅवर किसी भी दृष्टि से लोकतांत्रिक तथा न्यायपूर्ण नहीं माना जायेगा।

    प्रथम विश्व युद्ध के बाद राष्ट्र संघ अर्थात लीग आॅफ नेशन्स का गठन किया गया था। राष्ट्र संघ काफी हद तक प्रभावहीन था। पहले विश्व युद्ध के बाद राष्ट्र संघ (लीग ऑफ नेशन्स ) की स्थापना की गई थी। इसका उद्देश्य किसी संभावित दूसरे विश्व युद्ध को रोकना था, लेकिन राष्ट्र संघ 1930 के दशक में दुनिया के युद्ध की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने में विफल रहा और कुछ वर्षों के पश्चात इसे भंग कर दिया गया। द्वितीय विश्व के दौरान अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमया तथा नाकाशाकी में क्रमशः 6 तथा 9 अगस्त 1945 को पहली बार दो परमाणु बम गिराये थे। इन हमलों के महाविनाश से घबराकर 24 अक्टूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में इस बात का उल्लेख है कि किसी आपातकालीन स्थिति या गम्भीर समस्या के समाधान के लिये संयुक्त राष्ट्र की सेना गठित की जायेगी। संयुक्त राष्ट्र की कोई संयुक्त स्थायी सेना नहीं है, इसलिये यू.एन. की शान्ति सेना मंे विभिन्न राष्ट्रों के सैनिक शामिल किये जाते हैं, जिनका वित्तीय भार संयुक्त रूप से सदस्य राष्ट्रों द्वारा वहन किया जाता है।

    संयुक्त राष्ट्र संघ की उपस्थिति में स्टाॅकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार वर्तमान में विश्व के नौ देशों ने भारी संख्या में ऐसे परमाणु हथियार विकसित कर लिए हैं जिनसे मिनटों में यह दुनिया खत्म हो जाए। ये नौ देश हैं- रूस (8,000), अमेरिका (7,300), फ्रांस (300), चीन (250), ब्रिटेन (225), पाकिस्तान (120), भारत (110), इजरायल (80) और उत्तर कोरिया (60)। इन 9 देशों के पास कुल मिलाकर 16,445 परमाणु हथियार हैं। बेशक स्टार्ट समझौते के तहत रूस और अमेरिका ने अपने भंडार घटाए हैं, मगर तैयार परमाणु हथियारों का 93 फीसदी जखीरा आज भी इन्हीं दोनों देशों के पास है।

    विश्व के वोटरों को परमाणु बमों का जखीरा नहीं वरन् हमें लोकतांत्रिक ढंग से वोट की ताकत से चुनी विश्व सरकार चाहिए है। राजनैतिक सुधारक विश्वात्मा भरत गांधी का कहना है कि विश्व के प्रत्येक वोटर को अपने वोट की शक्ति को पहचान कर विश्व सरकार की बनाने की घोषणा करने वाली अपने-अपने देश की राजनैतिक पार्टी को ही अपना कीमती वोट देकर समर्थन देना चाहिए! वर्तमान में हमारे वोट से चुनकर बनने वाली विश्व भर की राष्ट्रीय सरकारे परमाणु शस्त्रों की होड़ में जनता का धन बरबाद कर रही हैं। जब प्रत्येक वोटर को वोटरशिप देने की बात उठायी जाती है तो यह पैसा न होने का बहाना बनाकर वोटर को मुर्ख बनाती आ रही हैं। वर्तमान में विश्व भर के करोड़ों की संख्या में जनता गरीबी के चलते भूख तथा कुपोषण से जान गंवा रही हैं। इन गरीब जनता की दर्दनाक पीड़ा से विचारशील वोटरों को इसी क्षण से आन्दोलित होना चाहिए।

    नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जान टिम्बरजेन ने कहा है कि राष्ट्रीय सरकारे विश्व के समक्ष उपस्थित संकटों और समस्याओं का हल अधिक समय तक नहीं कर पायेंगी। इन समस्याओं के समाधान के लिए विश्व संसद आवश्यक है, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ को मजबूती प्रदान करके प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए प्रभावशाली तथा लोकतांत्रिक वैश्विक व्यवस्था के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रजातांत्रिक एवं शक्तिशाली बनाकर विश्व संसद का स्वरूप शीघ्र प्रदान करना चाहिए। महान विचारक विक्टर ह्नयूगो ने कहा है कि ‘‘इस दुनियाँ में जितनी भी सैन्यशक्ति है उससे कहीं अधिक शक्तिशाली वह एक विचार होता है, जिसका कि समय अब आ गया हो।’’ वह विचार जिसका कि समय आ गया है। विश्वात्मा भरत गांधी का विश्वास है कि जय जगत (वसुधैव कुटुम्बकम्) तथा वोटरशिप वे दो विचार हैं जिसका समय आ गया है। इन दो सार्वभौमिक विचारों द्वारा विश्व को अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, पारिवारिक समस्याओं की विभीषिका से बचाया जा सकता है।

    विश्व के 3 बड़े नेताओं ने विश्व में एकता व शांति की स्थापना के लिए समय-समय पर प्रयास किये थे। ये तीन नेता इस प्रकार हैं – (1) प्रथम विश्व युद्ध के समय 1919 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री वुडरो विल्सन ने विश्व के नेताओं की एक बैठक आयोजित की, जिसके फलस्वरूप ‘लीग ऑफ नेशन्स’ की स्थापना हुई और सन् 1919 से 1939 तक विश्व में कोई अन्य युद्ध नहीं हुआ। (2) द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका के ही तत्कालीन राष्ट्रपति श्री फ्रैन्कलिन रूजवेल्ट ने 1945 में विश्व के नेताओं की एक बैठक बुलाई जिसकी वजह से 24 अक्टूबर, 1945 को ‘संयुक्त राष्ट संघ’ (यू.एन.ओ.) की स्थापना हुई। जिसके बाद विश्व में पिछले 74 वर्षों में कोई विश्व युद्ध अर्थात तृतीय विश्व युद्ध नहीं हुआ। लेकिन 74 वर्षों की इस अवधि में तृतीय विश्व युद्ध की परिस्थितियाँ बनती रही हैं। (3) फ्रांस के प्रधानमंत्री श्री राबर्ट शूमेन ने यूरोपीय देशों के नेताओं की एक बैठक बुलाने की पहल की।

    इस पहली बैठक में 76 यूरोपीय संसद सदस्यों ने प्रतिभाग किया जिसके परिणामस्वरूप यूरोपीय यूनियन व 28 यूरोपीय देशों की एक ‘यूरोपीय संसद’ गठित की गई। इस यूरोपीय संसद की वजह से आज पूरे यूरोप में स्थायी एकता व शांति स्थापित है। आज यूरोपीय यूनियन में 28 यूरोपीय देश पूर्ण सदस्य राज्यों की तरह से हैं। यूरोपीय यूनियन के 18 देशों ने अपनी राष्ट्रीय मुद्रा को समाप्त कर ‘यूरो’ मुद्रा को अपनी राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में अपनाया है। श्री राबर्ट शूमेन द्वारा मानव जाति के हित में उठाया गया यह एक महत्वपूर्ण कदम था।

    हमने इतिहास में देखा है कि केवल तीन अवसरों पर (1) लीग आॅफ नेशन्स के गठन में (2) संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन में व (3) यूरोपियन यूनियन के गठन में विश्व के देशों ने मिलकर एकता तथा शान्ति का मार्ग चुना था। प्रत्येक बार वे इसलिए सफल रहे क्योंकि ‘एक व्यक्ति’, जो अपने आप पर विश्वास रखता था, जिसके हृदय में पवित्र इच्छा थी, उसने साहस के साथ आगे बढ़कर सभी विश्व के नेताओं की एक बैठक बुलाई। हमारा मानना है कि विश्व के नेताओं की बैठक बुलाना आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जिसका कि अब समय आ गया है। भारत को विश्व शान्ति के लिए पहले चरण में दक्षिण एशियाई सरकार के गठन की पहल करने का यह उपयुक्त समय जैसा कि हमने इतिहास में देखा है कि 19वीं सदी यूरोपीय देशों की, 20वीं सदी अमेरिका की तथा अब 21वीं सदी एशियाई देशों की सरकार द्वारा विश्व को मार्गदर्शन देने की है।

    यूएनओ पूर्व महासचिव डा. कौफी अन्नान के अनुसार मानव सभ्यता के इतिहास में 20सदी सबसे विनाशकारी खूनी सदी रही है। 20वीं सदी की शिक्षा ने सारे विश्व में संकुचित राष्ट्रीयता पैदा की थी जिसके दुखदायी परिणाम दो प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्धों, हिरोशिमा व नाकासाकी का महाविनाश तथा राष्ट्रों के बीच अनेक युद्धों के रूप में सामने आ चुके हैं। प्रतिवर्ष विश्व के 155 देशों का रक्षा बजट बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस पर सभी देशों को मिल-बैठकर विचार करना चाहिए।

    आतंकवाद तथा पड़ोसी देशों से देश को सुरक्षित करने के लिए शान्ति प्रिय देश भारत को भी अपना रक्षा बजट प्रतिवर्ष बढ़ाना पड़ रहा है। भारत का रक्षा बजट दुनिया में आठवें नम्बर पर है। हम जैसे गरीब देश रक्षा बजट के मामले में जर्मनी आदि देशों से आगे हैं। युद्ध तथा युद्धों की तैयारी में हजारों करोड़ डालर विश्व में प्रतिदिन खर्च हो रहे हैं। शान्ति पर कुछ भी खर्चा नहीं आता है। युद्धों तथा युद्धों की तैयारी से पैसा बचाकर इस पैसे से संसार के प्रत्येक बच्चे के लिए शिक्षा, सुरक्षा, चिकित्सा, रोटी, कपड़ा और मकान की अच्छी व्यवस्था की जा सकती है। साथ ही सभी वोटरों के अधिकार की धनराशि को वोटरशिप के रूप में बड़ी आसानी से देने की व्यवस्था की जा सकती है।

    वर्ष 2001 से प्रतिवर्ष लखनऊ में आयोजित होने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 पर आधारित विश्व के मुख्य न्यायाधीशों के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन के संयोजक एवं विश्व एकता की शिक्षा के प्रबल समर्थक शिक्षाविद् डा. जगदीश गांधी का मानना है कि युद्ध के विचार मानव मस्तिष्क में पैदा होते हैं। इसलिए मानव मस्तिष्क में ही शान्ति के विचार डालने होंगे। मनुष्य को विचारवान बनाने की श्रेष्ठ अवस्था बचपन है। संसार के प्रत्येक बालक को विश्व एकता एवं विश्व शांति की शिक्षा बचपन से अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए। डाॅ. गाँधी के संयोजन में विश्व के मुख्य न्यायाधीशों के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में अब तक 133 देशों के 1222 मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीश, हेड ऑफ दि स्टेट/गवर्नमेन्ट, संसद के स्पीकरों ने प्रतिभाग किया है। इन सम्मेलनों में मुख्य न्यायाधीशों, न्यायाधीशों, कानूनविदों् एवं शांति प्रचारकों ने प्रतिभाग करके विश्व संसद, विश्व सरकार तथा वल्र्ड कोर्ट ऑफ जस्टिस के गठन को अपना सर्वसम्मति से समर्थन दिया है। विगत 19 वर्षों की भांति ही इस वर्ष भी भारत के साथ ही विश्व के 2.5 अरब बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ द्वारा विश्व के मुख्य न्यायाधीशों का 20वां अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 8 से 12 नवम्बर, 2019 तक लखनऊ में आयोजित किया जा रहा है। जिसमें विश्व के 73 देशों के 254 मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीश, स्पीकर्स, राष्ट्र प्रमुख एवं कानूनविद् पधार रहे हैं।

    हेग, नीदरलैण्ड में इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्ट्सि का मुख्यालय स्थित है। इस अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय किसी देश के लिए बाध्यकारी नहीं है। इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्ट्सि, हेग के पूर्व वाइस प्रेसीडेन्ट न्यायमूर्ति सी.जी. वीरामंत्री, श्रीलंका जो दुनिया में प्रख्यात न्यायाविदों में गिने जाते हैं, परमाणु निरस्त्रीकरण अभियान की अगुवाई कर रहे हैं। उनका तर्क है कि परमाणु हथियार अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून व तमाम धर्मों के सिद्धांतों के खिलाफ है। वाकई, बौद्ध, ईसाई, हिंदू या इस्लामी धर्मग्रंथों में जन-संहारक हथियारों का विरोध किया गया है।

    राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि विश्व में वास्तविक शांति लाने के लिए बच्चे ही सबसे सशक्त माध्यम हैं। उनका कहना था कि ‘‘यदि हम इस विश्व को वास्तविक शान्ति की सीख देना चाहते हैं और यदि हम युद्ध के विरूद्ध वास्तविक युद्ध छेड़ना चाहते हैं, तो इसकी शुरूआत हमें बच्चों को शान्ति की शिक्षा देने से करनी होगी।’’ नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नेलशन मण्डेला ने कहा था कि शिक्षा ही सबसे शक्तिशाली हथियार है जिससे विश्व को बदला जा सकता है।

    विश्वात्मा भरतगांधी का मानना है कि शिक्षा तथा वोटरशिप दो शक्तिशाली हथियार है जिससे विश्व को बदला जा सकता है। वोटर की हैसियत से हमारा विश्व के सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों से अपील है कि संसार के प्रत्येक नागरिक द्वारा चुनी हुई विश्व सरकार, लोकतांत्रिक ढंग से गठित विश्व संसद (वीटो पाॅवर रहित) तथा प्रभावशाली विश्व न्यायालय जिसके निर्णय संसार के प्रत्येक व्यक्ति पर समान रूप से लागू हो! ऐसा आतंकवाद रहित तथा युद्ध रहित विश्व बनाने का समय रहते निर्णय लें।

    विश्वात्मा भरतगांधी के मार्गदर्शन में विश्व परिवर्तन मिशन ने पहले चरण में दक्षिण एशियाई सरकार के गठन करके वोटरशिप की धनराशि बढ़ाने का अभियान जोरदार ढंग से भारत में शुरू किया है। आगे मिशन का पूरा विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्ति प्रदान करके वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था (विश्व संसद), विश्व सरकार तथा विश्व न्यायालय के गठन का मार्ग प्रशस्त होगा। दक्षिण एशियाई सरकार के गठन से इन देशों के बीच युद्ध, घृणा, हिंसा व दूरी समाप्त होगी व इन देशों की एकता से इनकी ताकत बढ़ेगी।

    युवा जज्बे तथा जुनून से भरे विश्वात्मा भरत गांधी विश्व परिवर्तन मिशन के संस्थापक है। वह देश भर में जाकर मिशन के परिवारों में रहकर अपने वोटरशिप के आन्दोलन को निरन्तर गति दे रहे हैं। वोटरशिप को उन्होंने राष्ट्रीय स्वीकार्ता दिलायी है। उनका यह पक्का विश्वास है कि अति आधुनिक युग में देश स्तर पर तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी, बेरोजगारी पारिवारिक कटुता, सामाजिक बुराइयों, युद्धों तथा काफी हद तक आर्थिक तंगी के चलते आतंकवाद की राह की ओर कदम बढ़ाने वाले युवाओं को वोटरशिप अधिकार कानून नेकी की राह पर चलने के लिए प्रेरित करेगा।

    मीडिया के बन्धु भी देश के एक जिम्मेदार वोटर भी है। वह वोटर के एक-एक वोट की ताकत को भली-भांति समझते हैं। वोटर ही देश के असली मालिक है। यह नेतातंत्र तथा लोकतंत्र के बीच का महाभारत है। विश्वात्मा बनकर करोड़ों लोगों की चीत्कार को संवेदनशील मीडिया को सबसे पहले महसूस करना चाहिए। इस वरिष्ठ वोटर की हैसियत से प्रत्येक विश्वात्मा को जगाने का मेरा एक छोटा सा प्रयास है। जिसे अपनी अन्तिम सांस तक करता रहूंगा। यह राम के द्वारा समुद्र पर रामसेतु के बनने के समय चीटीं-गिलहरी की तरह अपनी पूरी शक्ति से किया जाना वाला मेरा योगदान है। राम का काज किए बिना मुझे कहां विश्राम है। अब प्रत्येक वोटर को मानव जाति के फूटे भाग्य को संवारने का फैसला करना है? गम्भीरता हमें सोचना है कि हम राम के पक्ष में है या रावण के पक्ष में। पाण्डव बनकर सत्य का साथ देते हैं या अन्यायी बनकर कौरव का साथ देते हैं? सत्य मेव जयते – जय जगत।

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