समाज में सम्पत्ति को लेकर तरह-तरह के विचार हैं लेकिन एक बात सच यह है कि सभी को इसकी जरूरत होती ही है। बात केवल जरूरत तक ही सीमित हो तब तो कोई बात ही नहीं है क्योंकि आवश्यकतानुसार सभी लोग इसकी व्यवस्था कर लेते परन्तु जब अधिकाधिक की लालसा सर्वोपरि हो, उसमें प्रतिस्पर्धा भी हो तब मामला असन्तुलित हो जाता है। इसे अच्छी स्थिति नहीं कहा जा सकता, हालांकि कमोबेश ऐसा सभी जगहों पर होता है।
जब यह चलन तेजी के साथ विकसित होता है तब अमीर और गरीब के बीच खाई भी निर्मित होती है जो कम होने का नाम ही नहीं लेती। एक ऐसा ही अध्ययन बताता है कि भारत के कुल 63 अरबपतियों की सम्पत्ति देश के पिछले साल के बजट से भी ज्यादा है। देश की एक फीसद अमीर आबादी की कुल सम्पत्ति 70 फीसदी निचले तबके की सम्पत्ति के चार गुने से भी ज्यादा है।
एक विश्लेषण यह भी बताता है कि दुनिया के 2,153 अरबपतियों की सम्पत्ति 60 फीसद यानी करीब 4.6 अरब आबादी की संयुक्त सम्पत्ति से ज्यादा है। इन उदाहरणों यह तथ्य स्पष्ट होता है कि इस समय दुनिया में असमानता की स्थिति बेहद चिन्ताजनक है। इसकी सबसे जिम्मेदार वजह वे नीतियां मानी जाती हैं जो अमीर को और अमीर, गरीब को और गरीब बनाती हैं। इन नीतियों के कारण अनजाने में भी गड़बड़ियां होती हैं और जानबूझकर भी की जाती हैं। उद्देश्य केवल अधिकाधिक धन का अर्जन होता है। इसे आर्थिक अपराध के रूप में समाज लगातार देखता है पर चूंकि यह मिला खेल होता है, इसलिये वह कुछ कह या कर नहीं सकता।
ध्यान रखने की बात है कि लम्बे समय से यह धारण पुष्ट होती जा रही है कि सरकारें आर्थिक नीतियां कुछ विशिष्ट लोगों के हितसाधन को ध्यान में रखकर बनाती हैं। इनमें व्यापार-व्यवसाय के लिये विभिन्न मदों में छूट देने के कदम तो शामिल हैं। दूसरी ओर आर्थिक अपराध भी हैं। इनके अलावा भ्रष्टाचार के अनेक रूप अमीरों की अच्छी-खासी नर्सरी बने हैं जिनके पीछे कभी सत्ता की शक्ति नजर होती है तो कभी धन व बाहुबल की ताकत जिनसे आमतौर पर लोग भिड़ना नहीं चाहते। गैरबराबरी के इसी सिलसिले के जारी रहने के कारण समाज का विकास अपेक्षित रूप से नहीं हो पा रहा है।
कभी तो यह सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भी केवल औपचारिकता बन चुका लगता है जिसका कोई मतलब नहीं होता। यह ऐसी स्थिति बनती जा रही है जिसका इलाज जरूरी है और यह है गैरबराबरी का खात्मा। यह कदम उठाने के लिये सरकार को भी नैतिक रूप से सशक्त होना होगा और समाज को भी अपनी चेतना का परिष्कार करना होगा।






