गनौर फैक्ट्री में वर्कर्स का अनोखा विरोध:
गनौर (हरियाणा), 21 अक्टूबर 2025 : दिवाली की रौनक में जहां घर-घर खुशी का संदेश बिखर रहा है, वहीं एक फैक्ट्री के वर्कर्स के चेहरों पर गुस्से और निराशा की लकीरें खिंच गईं। साल भर की कड़ी मेहनत के बदले बोनस की आस लगाए बैठे मजदूरों को कंपनी ने न सिर्फ खाली हाथ लौटाया, बल्कि एक डिब्बा सोहनपपड़ी थमा दिया। लेकिन वर्कर्स ने इसे अपमान मानते हुए सारे डिब्बे फैक्ट्री के मुख्य गेट पर ही पटक दिए। यह घटना न सिर्फ श्रमिक शोषण की पोल खोलती है, बल्कि पूंजीपति मानसिकता पर भी सवाल खड़े करती है।फैक्ट्री में काम करने वाले एक वर्कर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हम लोग दिन-रात मशीनों के सामने झुककर काम करते हैं। दिवाली पर बोनस मिलना तो हमारा हक है, लेकिन प्रबंधन ने कहा कि कंपनी को घाटा हो रहा है, इसलिए सिर्फ मिठाई लो। सोहनपपड़ी का एक डिब्बा! क्या यही है हमारी मेहनत की कीमत?” उनका गुस्सा देखते ही देखते भड़क उठा। करीब 50 से ज्यादा वर्कर्स ने एकजुट होकर डिब्बों को गेट पर ही फेंक दिया और नारे लगाने लगे – “बोनस दो, या काम छोड़ दो!”

यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। एक यूजर ने लिखा, “यह सिर्फ एक फैक्ट्री की कहानी नहीं, लाखों मजदूरों की आवाज है।” वर्कर्स का कहना है कि वे साल भर ओवरटाइम देकर कंपनी को मुनाफा कमाने में मदद करते हैं, लेकिन त्योहारों पर उनके हिस्से सिर्फ खोखली तसल्ली आती है। एक महिला वर्कर ने भावुक होकर कहा, “बच्चों के लिए नया कपड़ा भी न खरीद सकें, तो दिवाली कैसे मनाएं? यह शोषण नहीं तो क्या है?”
कानूनी तौर पर, पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट 1965 के तहत, जहां कंपनी का मुनाफा 20% से ज्यादा हो, वहां न्यूनतम 8.33% बोनस देना जरूरी है। लेकिन कई फैक्टरियां इसे ठेंगा दिखा देती हैं। गनौर की इस फैक्ट्री में भी यही हुआ लगता है। स्थानीय श्रम विभाग ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया, लेकिन वर्कर्स ने चेतावनी दी है कि अगर बोनस न मिला, तो हड़ताल और तेज होगी।
लोगों ने दी प्रतिक्रिया :
- जफ़र ने कमेंट किया : एक ही दिन होता है जब कर्मचारी उपहार का इंतज़ार करते हैं। ऐसी चिंदीचोरी नही करनी चाहिए।
- प्रभात ने लिखा : कुछेक को छोड़कर अधिकांश सभी प्राइवेट कंपनीयों का यही हाल है दीपावली के आते ही मालिकों पर गमों का पहाड़ टूट पड़ता है उनका बर्ताव ऐसा हो जाता है कि कंपनी को ना जाने कितना नुक़सान हो गया है अगर वो अपने कर्मचारियों को बोनस व मिठाई दे देंगे तो मालिक रोड पर आ जाएंगे।
- भारत ने लिखा : बोनस हर कर्मचारी का हक है चाहिए वो परमानेंट हो या कज़्वल कर्मचारी हो ओर इस लिए कंपनी पर सख्त कारवाही होनी चाहिए।
यह घटना याद दिलाती है कि कैसे ब्रिटिश काल से चली आ रही बोनस परंपरा आज भी मजदूर आंदोलनों से ही जन्मी थी। 1940-50 के दशक में हड़तालों ने ही इसे कानूनी हक बनवाया। आज भी, जब कंपनियां मुनाफे के नाम पर मजदूरों का हक मारती हैं, तो विरोध की चिंगारी भड़कना लाजमी है। क्या गनौर के ये वर्कर्स अपनी लड़ाई जीत पाएंगे? या फिर यह सिर्फ एक और दबी हुई आवाज बनकर रह जाएगी? समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है – मेहनतकशों का गुस्सा अब दबने वाला नहीं।






