लखनऊ, 3 सितंबर: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गंभीर बीमारी से जूझ रहे बंदियों की समयपूर्व रिहाई के नियमों को और अधिक सरल, स्पष्ट और मानवीय बनाने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप एक पारदर्शी नीति तैयार की जाए, जिससे पात्र बंदियों को रिहाई के लिए अलग से आवेदन न करना पड़े।
सोमवार को कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवाओं की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने प्राणघातक रोगों से पीड़ित, वृद्ध और असहाय बंदियों की वास्तविक संख्या जानने के लिए प्रदेश के सभी कारागारों में सर्वेक्षण कराने का निर्देश दिया। उन्होंने महिलाओं और बुजुर्गों को प्राथमिकता के आधार पर रिहाई देने की व्यवस्था बनाने को कहा। साथ ही, बंदियों को कृषि और गोसेवा जैसे कार्यों से जोड़कर उनकी जेल अवधि का सकारात्मक उपयोग करने की बात कही।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि असाध्य रोगों की परिभाषा जेल मैनुअल में स्पष्ट होनी चाहिए। उन्होंने यह भी जोर दिया कि समाज की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, इसलिए हत्या, आतंकवाद, देशद्रोह और महिलाओं-बच्चों के खिलाफ जघन्य अपराधों में सजा काट रहे बंदियों को रिहाई नहीं दी जाएगी।
स्वत: समीक्षा की व्यवस्था
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि हर साल जनवरी, मई और सितंबर में पात्र बंदियों की रिहाई के मामलों की स्वत: समीक्षा हो। यदि किसी बंदी को रिहाई नहीं दी जाती, तो इसके कारण स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाएं और बंदी को वह निर्णय चुनौती देने का अधिकार हो।
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की प्रणाली पर विचार
बैठक में अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की प्रणाली को उत्तर प्रदेश में लागू करने पर विचार किया जा रहा है, ताकि बंदियों को उनके न्यायिक अधिकार मिल सकें।







