बचपन में एक कहानी पढ़ी थी -शीत बसंत की है तो लोककथा। पता नहीं किसने लिखा था। पूर्वांचल में बहुत लोकप्रिय है। पहले बाजार में पुस्तक भी मिलती थी।बड़ी करुण कहानी है शीत बसंत बच्चों की। यह कथा सभी भाषाओं में थोड़े हेरफेर से मिलती है। शीत बड़ा है बसंत छोटा। मैंने पढ़ा नहीं अपने गाँव में सुनी थी यह कहानी।
एक भाव आता था यही नाम क्यों ? अब सोचता हूँ क्या ऋतु से ही इसका कोई तादात्म्य है, निहितार्थ है । लोक कथायें बिना निहितार्थ नहीं होतीं ।
बसंतपंचमी शीत के साथ ही आती है । उसका शैशव शीत के साथ बीतता है। बड़े होने पर शीत से दूर हो जाता है और भटक कर प्रचंड ताप ग्रीष्म में सहता है । तो क्या यह कथा लोक का प्रकृति प्रतीक है।
जो भी हो बसंतपंचमी बसंत का जन्मदिन है। शीत कुहरे की चादर में बसंंत को लपेटे आता है और हम ठिठुरे सिकुड़े भी बसंत हो जाते हैं । शीत का भय समाप्त हो जाता है। हम डरते नहीं वैसे ही जैसे मँहगाई, बेरोजगारी भुखमरी से परेशान रहते जूझते बजट में कार टीवी पर राहत, रियलस्टेट में मकान पर छूट और आयकर में दस हजार की राहत हवाई यात्रा के टिकट में रियायत सुन उनकी खुशी बढ़ जाती है जिनकी कोई आय नहीं है। न्यूज़ चैनल पर सुनते हैं देश बदल गया, हम खुश । मँहगाई गरीबी गायब होगी, जहाँ होगी देश में नहीं है। बजट बसंत ही है आता है और हम लाख करोड गिनते सुनते हैं ।
अब देश घर घर चूल्हा देखने तो जायेगा नहीं। बसंत भी घर घर कहाँ जाता है। आ गया यही बहुत है। बसंत मेरे घर आये या न आये हमें उसको लायक बनना होगा । हमें पीले फूल लाने होंगे पूजा करनी होगी। ऋतुराज है, राजा का स्वागत करना ही होगा।
सोचता हूँ सरकारें भी तो बसंत ही हैं और गरीबी शीत ।
बसंत आ गया! पड़े कुहरा, रहे धुंध , गिरे बर्फ बसंत है तो क्यों डर ? न मिले रोटी। गैस है रोशनी है मेले हैं नौकरियाँ तय हैं फिर भी सिसियाते हैं। ये शीत के मारे हैं । इन्हें इस बसंत में भी शीत लग रही है ।
ये दकियानूस है अब भी नहीं सुधरते ।उनको चिंता है अभी भी बेरोजगारी मँहगाई की, भूख के पाले की।
बसंतप्रेमी लोग धिक्कारते हैं बसंत आ गया ये डर रहा है ।जो नहीं डरते , उनसे डरते डरते मैं पूछता हूँ तुम्हारी शीत गयी, तुम सुखी हो ।वे कहते हैं गयी नहीं यार ।शीत तो है,पर करूँ क्या बसंत तो हर जगह कहता घूम रहा है मैं आ गया हूँ ।
मैंने समझाया -बसंत बताया नहीं जाता महसूसा जाता है, महसूस हुआ ।
वह बोला- “महसूसा तो नहीं क्योंकि कभी देखा ही नहीं ! हमारे लिए शीत हमेशा है। पर एक झूठ को सच मानने में बुराई क्या है। बसंत आये न आये ।क्योंकि आयेगा भी तो वहीं जहाँ कभी शीत भी नहीं गयी । ”
यार बुरा न मानना हम लोगों के पास बसंत कभी नहीं आयेगा मानना ही पड़ेगा ।
“चलो मान लेते है । ”
मैंने माना तो नहीं पर मन को मार लिया दरवाजे पर खड़े आम के ठूँठ पेड़ की तरह जो हर साल बसंत की प्रतीक्षा करता है पर बौर कहाँ । पूछा -“तुम्हारे पास बसंत क्यो नहीं आता?”
उस बूढ़े ठूँठ ने समझाया-” पहले पत हो फिर अपत होने का साहस । बसंत वहीं आता है । जिनके पास पत नहीं वे अपत क्या होंगे और अपत नहीं तो बसंत उनके लिए बस एक खबर है ।” – डॉ लक्ष्मी कान्त पाण्डेय







