राक्षसी प्रवृत्ति के एक रेपिस्ट के लिए तीन फंदे तैयार रखिए

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  • कुदरत का नियम और दुनिया का नियम लगभग एक जैसा होता है
  • सरकारें और सभ्य समाज की उदासीनता भी है बलात्कार की ज़िम्मेदार

 

नवेद शिकोह

राक्षसी प्रवृति वालों को फांसी होना चाहिए है। बलात्कारी के खिलाफ सख्त कानून भी पास हो जायेगा। बलात्कारियों को बहुत आसानी से फांसी पर चढ़ाया जा सकेगा। इन नेक काम में फिर ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। विलम्ब नहीं होगा। हर दिन अखबार के पन्नों पर फांसी की खबर होगी। फांसी देने का सिलसिला तेज़ हो जायेगा, लेकिन रेप के सिलसिले की रफ्तार कम नहीं होगी। निर्भयाओं पर जुल्म जारी रहेगा। 

क्यों ! क्योंकि फांसी की सजा रेप की घटनाओं को खत्म करने के लिए अक्षम है। फांसी रेप रोकने में सक्षम होती तो चौराहे पर रेपिस्ट का सर काटने वाले इस्लामी देशों में बलात्कार की घटनाएं इतिहास बन गई होतीं।

दरअसल ऐसी सख्त सजाएं अधूरी सज़ा होती है। ऐसी सज़ा से गुनाहगार के गुनाह को पैदा करने वाले के गले तक फंदा नहीं पंहुचता है।

कुदरत का नियम और दुनिया का नियम लगभग एक जैसा होता है। जब हम नियम के खिलाफ चलने लगें तो कुदरत हमें नहीं रोकेगी। दुनिया वाल़ों को हमे रोकना होगा। नहीं तो प्रलय आयेगा और कुदरत सबको सबक सिखा देगी। हम पेड़ लगायें नहीं और पेड़ काटते रहें। जंगल उजाड़ते रहें। धरती का दोहन करते रहें। पर्वतों को छेड़ें, तालाब पाटते रहें। कुंओं और ट्यूबवेल से पानी खीचते रहें। हवा और पानी प्रदूषित करते रहें। सरकार हमें नहीं रोके। आंखें बंद रखे। बल्कि हमारे इस गुनाह में हमारा साथ दे। या सरकार खुद भी प्राकृतिक संतुलन बिगाड़े तो एक दिन प्रलय आ जायेगा। क़ुदरत जवाब देगी। भूकंप या सोनामी सबका नाश कर देगी।

इंसान की रचना भी क़ुदरत की ही सृजनात्मकता है। पेड़, पौधों, नदियों, समुंदरों, हवा,पानी, पशु-पक्षियों और ये धरती को कुदरत ने तुम्हें इनाम दिया है। इसका ख्याल रखना तुम्हारा फर्ज है। इन कुदरती नेमतों की रक्षा-सुरक्षा का अधिकार तुम छीन नहीं सकते। नदियों और सागरों का अधिकार छीनोगे तो तुम्हारी प्यास बुझाने वाला तुम्ही को निगल जायेगा।

ऐसे ही यदि तुम बच्चों का बचपन छीनोंगे तो ये किशोरावस्था में आते-आते हैवान बन कर हैवानियत दिखाने लगेंगे।
हर बच्चे के बहुत सारे अधिकार हैं। तुम बच्चों का बचपन छीन लो। ना उसके तन पर ढंग के कपड़े हों, ना सर पर छत हो, ना पेट में रोटी हो, ना उन्हें शिक्षा मिले और ना संस्कार। ना उसे प्यार मिले और ना ही कोई सभ्य समाज वाला उनसे सीधे मुंह बात करे। वो बाल मजदूर बनके पेट की भूख शांत करे। उसे दारू पिलाकर ट्रक ड्राइवर उसका शारीरीक शोषण करे। एक बच्चा खल्लासी या क्लिनर बन कर जंगलों के बीच गुजरती ट्रकों और बसों में दिनो-रात रहे। उसे नींद ना आ जाये। वो सो ना जाये इसलिए गाड़ियों में डीजल-पेट्रोल की जरुरत की तरह नशा उसकी जरुरत बना दी जाये।
ऐसे बच्चे क्या किशोरावस्था में पंहुच कर सभ्य समाज का हिस्सा बनेंगे ! ऐसा सोचना भी मूर्खता है। ऐसे बच्चे हैवान बन जायेंगे। राक्षस बन जायेंगे। राक्षसी प्रवृति के ऐसे किशोर जब सभ्य समाज के साथ राक्षसी प्रवत्ति के तहत हैवानियत दिखायें। रेप करें।

रेप करके मासूम लड़कियों को जिन्दा जला दें तो फिर हम क्या करेंगे ! वहीं करेंगे जो करने जा रहे हैं। आदमीनुमा इन राक्षसों को फांसी पर लटका देंगे।

दरअसल बलात्कारियों को फांसी पर लटकाने के फैसले पर ख़ुश हो रहे या चौराहे पर रेपिस्ट का सिर काटने की मांग कर रहे या इन रेपिस्ट की लीचिंग की मांग कर रहे सभ्य समाज वाले हम भी अंजाने में रेप की घटनाओं के जिम्मेदार होते हैं। ये हम नहीं समझ पा रहे हैं।

भूखे, अशिक्षित और संस्कारों से वंचित बच्चे किस तरह बाल मज़दूरी में झोक दिए जाते हैं। उन्हें शिक्षा कौन देगा ! संस्कार कौन देगा, बचपने का हक़ कौन देगा !

कोई कुछ नहीं देगा। उनसे जानवरों से ज्यादा काम लेने के लिए उन्हें जानवर जैसा बनाया जाता है। बसों में क्लीनर और ट्रकों में खल्लासी के काम में लगे 12-14 साल के बच्चे चौबीस घंटे ट्रकों पर रहते हैं। जंगलों से ग़ुज़रती ट्रकों में संस्कारहीनता और नशे की आग़ोश में पलते बच्चे हैवान से भी बद्तर हो जाते हैं। जब इनके हार्मोन्स बदलते हैं.. तब ये किशोरावस्था में सैक्स की भूख या बॉयलोजिकल नीड से ग़ुजरते वक्त संस्कारहीन, समाजहीन और प्यार के तरसे ये किशोर वहशी दरिंदे जैसे हो जाते हैं। मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री भी यही कहते हैं कि इस क़िस्म के किशोरों का पागल जानवरों सा व्यवहार हो सकता है। जब ये अमानवीयया की परिकाष्ठा पर उतर आते हैं.. हैवानों की तरह रेप करते हैं।
तब हम उनका चौराहे पर सर काटने की मांग के साथ सड़कों पर उतर आते हैं। चौराहे पर लटकाने की बात करते हैं। हमारे सांसद इन रेपिस्ट की लीचिंग करने का सुझाव देते हैं।

लेकिन हम सभ्य समाज के लोगों के सामने जब गरीब बच्चे बच्पनें, संस्कारों, रोटी, छत, पढ़ाई के अधिकारों से वंचित होकर खूंख़ार हैवान बन रहे होते हैं तब हम कहां होते हैं !! मंदिर-मस्जिद कर रहे होते हैं। या दो से चार, चार से आठ.. जैसी अंतहीन इच्छाओं की हवस में अंधे होते हैं। हम अपने बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर या किसी बड़े मुकाम पर ले जाने के सपनों को साकार करने की जुगत में लगे होते हैं।

कंकरीट के जंगल नुमे ऊंचे-ऊंचे महल बनाने की तरह। आसपास उजड़ते जंगलों, काटे जा रहे पहाड़ों और धरती के दोहन की फिक्र के बिना अपनी इमारते.. अपने महल खड़े करते रहेंगे तो एक दिन प्रलय आयेगा ही। भूकंप या सोनामी का खतरा बना रहेगा।

इसलिए अपने परिवार की ही नहीं अपने आसपास की भी फिक्र कीजिए। देखिये प्राकृति के साथ कोई खिलवाड़ तो नहीं हो रहा है। नदी और हवा की शीतलता-पवित्रता छीनकर उसमें जहर तो नहीं घोला जा रहा है।

किसी बच्चे का बचपन छीन कर उसे राक्षसी प्रवृत्ति के साचे में तो नहीं ढाला जा रहा है। और यदि ऐसा हो रहा है तो उस आदमी नुमा राक्षसी प्रवृत्ति के राक्षस की फांसी का फंदा तैयार कर लीजिए। वो किशोरावस्था में जरूर रेपिस्ट बनेगा।
लेकिन उसके फंदे के साथ दो और फंदे तैयार होना चाहिए हैं। एक बचपन छिनता देखती सरकारों के लिए और एक उदासीन सभ्य समाज के लिए।

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