चीन को देना होगा उसी की भाषा में करारा जवाब

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प्रशांत कुमार

हमारी भारतीय सीमाएं सुलग रही हैं। ताजा लपट लद्दाख की गलवान घाटी में दहकी है। और अब दूसरा नया मामला हिमाचंल प्रदेश से लगी सीमा पर चीन ने 20 किमी लंबी सड़क का नया निर्माण कर होश उड़ा दिया है। भारत और चीन के बीच 1962 के बाद यह सबसे बड़ी मुठभेड़ है। सरकार इसे छिपाती हुई पकड़ी गयी है। चीन को अपने पाले में लाने की उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद आज चीन हमलावर मुद्रा में है।

बता दें कि डोकलाम से शुरू हुआ हमला आज गलवान घाटी तक पहुंचा है और यही चीनी बुखार है, जो नेपाल को भी चढ़ा है। देश के संदर्भ में सीमाओं का मतलब होता है संबंध! इसलिए अमेरिका या फ्रांस से हमारे संबंध कैसे हैं, इसका जायजा लेते समय हम यह जरूर ध्यान में रखें कि इनके साथ हमारी भौगोलिक सीमाएं नहीं मिलती हैं। सीमाओं का मिलना, यानी रोज-रोज का रिश्ता, तो मतलब हुआ रोज-रोज की बदनीयती भी, बदमजगी भी और बदजबानी भी! और यह संबंध यदि फौजपुलिस द्वारा ही नियंत्रित किया जाता है, तब तो बात बिगड़नी ही है। इसलिए जरूरी है कि राजनयिक स्तर पर संवाद बराबर बना रहे और शीर्ष का नेतृत्व गांठे खोलता रहे। यह बच्चों का खेल नहीं है, मनोरंजन या जय-जयकार का आयोजन भी नहीं है। अपनी बौनी छवि को अंतरराष्ट्रीय बनाने की ललक इसमें काम नहीं आती है।

सीमा का सवाल आते ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यह सबसे हृदयहीन चेहरा सामने आता है, जहां सब कुछ स्वार्थ की तुला पर ही तौला जाता है। वर्ष 1962 में यही पाठ जवाहरलाल नेहरू को चीन से सीखना पड़ा था, और आज 2020 में नरेंद्र मोदी भी उसी मुकाम पर पहुंचते लग रहे हैं। इतिहास की चक्की बहुत बारीक पीसती है।

चीन का मामला एकदम ही अलग है। हमारे लिए यह मामला दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है, जैसा है। हमारी धरती उसके चंगुल में है। चीन सीमा-विस्तार के दर्शन को माननेवाला और एशियाई प्रभुता की ताकत पर विश्वशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा पालने वाला देश है। हममें से कोई भी आर्थिक दृष्टि से मजबूत हो, उसकी अंतरराष्ट्रीय हैसियत बड़ी हो, तो दूसरे को परेशानी होती है। यह सिर्फ चीन के लिए सही नहीं है, हमारे यहां भी ऐसी ‘बचकानी’ अंतरराष्ट्रीय समझ रखने वाले लोग सरकार में भी हैं और तथाकथित शोध-संस्थानों में भी।

मोदी सरकार ने इन सारी बातों को जानते हुए भी चीन को साथ लेने की कोशिश की थी, क्योंकि उसके सामने दूसरा कोई चारा नहीं था। दुनिया हमारे जैसी बन जाये, तब हम अपनी तरह से अपना काम करेंगे, ऐसा नहीं होता है। दुनिया जैसी है, उसमें ही अपना हित साधना सफल डिप्लोमेसी होती है। हम चाहें, न चाहें, इतिहास की सच्चाई यह है कि भारत-चीन के बीच का आधुनिक इतिहास जवाहरलाल नेहरू से शुरू होता है। इस सरकार की दिक्कत यह है कि यह इतिहास पढ़ती नहीं है और जवाहरलाल नेहरू से बिदकती है। इतिहास से ऐसा रिश्ता आत्मघाती होता है।

आजादी के बाद दो बेहद अक्रामक व क्रूर गुटों में बंटी दुनिया में नेहरू की दिक्कत कुछ अलग तरह की थी। उनके पास गांधी से मिले सपनों की आधी-अधूरी तस्वीर तो थी, लेकिन तलत महमूद के गाये, उस गाने की तरह ‘तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी’ का कठोर एहसास भी था। गांधी और उनका रास्ता, दोनों ही खतरनाक हद तक मौलिक था। नेहरू ने पहले ही इस गांधी को पहचान लिया था और उनसे अपनी दूरी तय कर ली थी।

लेकिन यह सच भी वे जानते थे कि भारत की किसी भी नयी भूमिका की परिपूर्ण तस्वीर तो इसी बूढ़े के पास मिलती है। इसलिए उन्होंने अपना एक आधा-अधूरा गांधी गढ़ लिया था, लेकिन उसके साथ चलने के रास्ते उन्होंने अपने खोजे थे। अमेरिकी व रूसी खेमे से बाहर तटस्थ राष्ट्रों के एक ‘तीसरे खेमे की परिकल्पना करना और फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसका प्रयोग करना जवाहरलाल से कमतर किसी व्यक्ति के बूते का था ही नहीं।

नेहरू की विदेश नीति का एक आधार यह भी था कि एशिया के मामलों से अमेरिका व रूस को किसी भी तरह दूर रखना। वे जानते थे कि इसके लिए चीन को साथ लेना जरूरी है। वे चीन, माओ और साम्यवादी खाल में छिपी चीनी नेतृत्व की पूंजीवादी मंशा को अच्छी तरह जानते थे। लेकिन वे जानते थे कि अंतरराष्ट्रीय प्रयोगों में मनचाही स्थितियां कभी, किसी को नहीं मिलती हैं। इसलिए चीन के साथ कई स्तरों पर रिश्ते बनाये और चलाये उन्होंने। बात कुछ दूर पटरी पर चली भी, लेकिन चूक यह हुई कि रिश्ते एकतरफा नहीं होते हैं।

नेहरू-विरोध का जो चश्मा आज सरकार ने पहन रखा है, उसे उतारकर देखेगी, तो पायेगी कि यह सरकार ठीक उसी रास्ते पर चल रही है जो नेहरू ने बनाया था। फर्क इतना ही है कि वह नवजात हिंदुस्तान था, पर आज का हिंदुस्तान सात दशकों की बुनियाद पर खड़ा है। आज अमेरिका, रूस और चीन की अंतरराष्ट्रीय भूमिका सिकुड़ती जा रही है। चीन को साबरमती नदी किनारे झूला झुलाकर, और अमेरिका को ‘दुनिया’ के सबसे बड़े स्टेडियम में खेल खिलाकर हमने देख लिया है कि नेहरू को 1962 मिला था, हमें 2020 मिला है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हम करीब-करीब अकेले हैं। लेकिन क्या कीजियेगा, रास्ता तो इसी में से खोजना है। इसके लिए जवाहरलाल नेहरू को खारिज करने की नहीं, उनका रास्ता समझने की जरूरत है।

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