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    Home»festival»Diwali

    दीपावली विशेष: हारिये न हिम्मत, बिसारिये न राम, तू क्यों सोचे बंदे जब सब की सोचे राम

    ShagunBy ShagunNovember 5, 2020 Diwali 3 Comments6 Mins Read
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    डाॅ. जगदीश गाँधी

    ‘हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम, तू क्यों सोचे बंदे जब सब की सोचे राम’ को अपने जीवन का मूल मंत्र मानकर यदि हम अपने जीवन को जीने लगे तो जीवन में आने वाली कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना हम आसानी से कर सकते हैं। वास्तव में मानव का सम्पूर्ण जीवन ही एक संघर्ष है। इसमें हमेशा उतार-चढ़ाव और सुख-दुख लगा रहता है। लेकिन कहते हैं कि जिनके पास साहस और प्रभु की कृपा है, वो कभी भी जीवन में असफल नहीं हो सकता है। इतिहास में भी उन्हीं के नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है जिन्होंने कठिन समय में भी साहस एवं प्रभु की शरण का परित्याग नहीं किया।

    ईश्वर से दूर होने पर जीवन में संघर्ष बढ़ जाते हैं: प्रत्येक बालक ईश्वर की सर्वोच्च कृति है। वह एक दयालु, पवित्र और ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय लेकर इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। लेकिन धीरे-धीरे खराब वातावरण और उद्देश्यविहीन शिक्षा के कारण बालक के जीवन में चार चीजे पैदा हो जाती हैं- (1) सबसे पहले बालक का ईश्वर से संबंध कट जाता है (2) ईश्वर से कटकर बालक अज्ञानता के अन्धेरे में चला जाता है (3) जिसके कारण उसे सही-गलत का ज्ञान नहीं रह जाता है तथा (4) उसके परिणामस्वरूप उसका सारा जीवन संघर्षों से भर जाता है। हमारा मानना है कि साहस और प्रभु की कृपा का भरोसा मनुष्य को जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों से बाहर निकल कर विजय प्राप्त करने में सहायता करतीं हैं।

    प्रभु की शरण में जाने से हमारे सभी कष्ट दूर हो जाते हैं: आत्मा के पिता परमात्मा पर पूरा विश्वास करके जब हम अपनी सारी चिंताएं उसे सौंप देते है तब वह हमारी सहायता के लिए बिना एक पल गवाये नंगे पांव दौड़ा चला आता है। प्रभु की शरण में जाने से ही वह हमारे सभी कष्टों को दूर करने के लिए आता है। प्रभु अपने सारे खजानों के पते अपने प्रिय भक्त को बता देता है। प्रभु ने धरती में मनुष्य के लिए सारी भौतिक चीजों के भण्डार भर रखे हैं। दयालु प्रभु शरीर की तकलीफों के भी सारे उपाय बता देता है। वह जीवन की सभी समस्याओं का हल और सावधानी से जीवन में चलने के तरीके बता देता है। इस प्रकार भौतिक जीवन की यात्रा सुगम हो जाती है और सुख, संतोष, हर्ष और आत्मा के आनन्द की राह प्रशस्त हो जाती है।

    जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही प्रभु की कृपा प्राप्त करता है: राम ने अपने सारे जीवन के द्वारा मर्यादा का पाठ जन-जन को पढ़ाया। राम का धरती पर अवतरित होने का एकमात्र उद्देश्य अमर्यादित संसार में मर्यादायें स्थापित करना था। राम की नजर में छोटी-बड़ी जाति का भेदभाव नहीं था। मानवता उनका धर्म था। रामायण में प्रभु राम कहते हंै – निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा। जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट-छल तथा दूसरों में बुराई देखने वाला व्यक्ति नहीं भाता है। अंतिम समय में रावण निर्मल मन से ‘हे राम’ कहकर उनकी शरण में आया तो दूसरे ही पल राम ने उसे सारे पापों से मुक्त कर दिया।

    समर्पण से ही प्रभु की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है: रावण संसार के सारे पापियों को संदेश दे गया कि हे संसार के लोगों, तुम मेरे बराबर पाप क्या करोगे? मैंने अपनी एक भौतिक कुइच्छा की पूर्ति के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया। हाँ जैसे ही मेरे को यह बात समझ में आयी कि चाहे जितने पाप कर लो लेकिन बिना परमात्मा की शरण में आये मुक्ति नहीं है। दूसरे ही पल मैं प्रभु राम की शरण में आ गया। मैं अपने शरीर को तो नहीं बचा सका लेकिन मैंने अपनी आत्मा को बचा लिया। अतः यदि प्रभु की राह पर चलते हुए मृत्यु भी आ जाये तो भी हमें उसे प्रभु की इच्छा मानकर जीवन में सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। इस समर्पण से ही प्रभु की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है।

    दुःख के समय मर्यादा पुरूषोत्तम राम द्वारा उठाये कष्टों को याद करें: श्रीरामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है – सोइ जानइ जेहि देहु जनाई, जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। अर्थात जो परमात्मा की इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर उस पर चलने लगता है उसे परमात्मा अपना मित्र बना लेता है। इसलिए दुःख और संघर्ष में हमें सदैव अपने महान अवतारों के जीवन में आये कष्टों को याद करना चाहिए। भगवान राम का जीवन भी कष्टों से भरा हुआ था। पिता की आज्ञा पालन के लिए 14 वर्ष का वनवास, पत्नी सीता का हरण और फिर रावण के साथ भयंकर युद्ध जैसे अनेक कष्टों के बाद भी आखिर विजय भगवान राम की ही हुई और वे मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम कहलाये।

    परमात्मा समय आने पर हमारी सफलता के सारे रास्ते खोल देता है: परमात्मा के प्रति श्रद्धा एवं अटूट विश्वास ही हमें तूफानी समुद्रों के पार ले जाती है। पहाड़ों को हिलाती तथा समुद्र को लांघ जाती है। इस समस्त संसार को चलाने वाला कोई परमात्मा ही है, जो समय आने पर सभी रास्ते खोल देता है। इसलिए हमें जीवन की किसी भी आपात स्थिति में बिना घबराये सकारात्मक सोच के साथ निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए। विपरीत परिस्थितियों में भागने की बजाय हमें अपने साहस को अपना ढाल बना लेना चाहिए। जिसने भी इस बात को अपने जीवन में धारण कर लिया वह निश्चित ही स्वयं को सफलता के शिखर पर ले जा सकता है। यह जीवन सूत्र हमें मार्गदर्शन देता है कि हमें जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए। रोजाना हमें अपने ऊपर आध्यात्मिक विजय प्राप्त करनी चाहिए।

    अपने जीवन को आध्यात्मिक प्रकाश से प्रकाशित करें:

    दीपावली का पर्व सुख-समृद्धि, सुयश-सफलता, उन्नति, अंतस् की शुद्धता, पवित्रता और घर-आँगन की स्वच्छता की प्रेरणाओं से ओतप्रेात पर्व है ताकि अज्ञानता के अन्धकार की सारी बेड़ियाँ कट जाएँ और संसार का प्रत्येक व्यक्ति ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय धारण करके विश्व में सामाजिक परिवर्तन लाने का सशक्त माध्यम बने। इस अवसर पर हमें परमपिता परमात्मा से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें कार्य-व्यवसाय में सदैव उन्नति-प्रगति की ओर अग्रसर रहने और बुराइयों को त्यागकर अच्छाइयों को ग्रहण करके आत्मा का जीवन जीने की शक्ति दे, वास्तव में तभी हम सभी के लिए दीपावली की सार्थकता भी सिद्ध होगी। वास्तव में दीपावली मात्र एक पर्व अथवा त्योहार नहीं है, अपितु यह हमें अपने अंदर आत्मा का प्रकाश धारण करने की प्रेरणा देता है। मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपनी आत्मा का विकास करना है।

    • लेखक वरिष्ठ शिक्षाविद एवं सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ के संस्थापक-प्रबन्धक हैं।

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