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    फेसबुक के अनुभव!

    By December 10, 2017 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    Post Views: 568

    अंशुमाली रस्तोगी

    फेसबुक पर रहने के अपने फायदे-नुकसान हैं। पर, फेसबुक पर न रहने के भी अपने फायदे-नुकसान हैं। तकरीबन दो साल फेसबुक से दूरी बनाकर यह मैंने करीब से महसूस किया है। बताता हूं…।

    दो साल में मैंने फेसबुक पर अपने दो खाते बनाए और बाद में उन्हें थोड़े-थोड़े अंतराल में हमेशा के लिए हटा दिया। फिर एक छोटा-सा गैप लिया। उसके बाद एक और नया खाता बनाया। तीसरी दफा जब मैं फेसबुक पर लौटा। तो देखता हूं यहां का तो पूरा परिदृश्य ही बदल चुका है। फेसबुक में जो अंदरूनी बदलाव हुए सो हुए ही। साथ में सिक्योरिटी मेजर्स भी इतने तगड़े हो गए कि कुछ पूछिए मत।

    फिर किया मैंने ये कि अपने पिछले दोनों खातों में जो भी दोस्त-साथी थे उन्हें दोबारा जोड़ना शुरू किया। एक-एक कर सबको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजीं। पुराने कुछ साथियों ने तो रिक्वेस्ट पुनः स्वीकार कर भी ली। उनका दिल से शुक्रिया। पर साथ में यह प्रश्न जरूर दागा गया- ‘यार, हमें अमित्र (अन-फ्रेंड) क्यों कर दिया था?’ ये प्रश्न स्वभाविक ही था। इसका सहज उत्तर भी मैंने उन्हें दिया। कुछ पुराने साथी तो इतने व्यस्त हो लिए कि उन्होंने मेरी रिक्वेस्ट स्वीकार करना तो दूर साथ में जो संदेश इन-बॉक्स क्या था, वो नहीं पढ़ा। उनकी अति-व्यस्तताएं उन्हें मुबारक।

    उनमें से ज्यादातर ने तो यही सोचा होगा कि हमें अन-फ्रेंड करने के बाद महाराज फिर से रिक्वेस्ट भेज रहे हैं, लिस्ट में पुनः जुड़ने की। भला हम क्यों जोड़ें? पड़ी रहने दो ऐसे ही पेंडिंग। कोई नहीं। मैंने बुरा भी माना। हर व्यक्ति की अपनी मर्जी है, रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट करने या न करने की। कोई जोर थोड़े है।

    फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने के दौरन एक अनुभव यह भी हाथ आया कि बहुत से लोगों ने अपने फेसबुक की सिक्योरिटी को इतना मजबूत किया हुआ है कि किसी के द्वारा उन्हें रिक्वेस्ट भेजने से पहले फेसबुक आपसे पूछता कि ‘आप व्यक्तिगत रूप से उक्त सज्जन को जानते हैं या नहीं?’ कन्फर्म करने के बाद भी रिक्वेस्ट नहीं जा पाती। तब आपके पास उस सज्जन को ‘फॉलो’ करने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होता।

    जैसे बिना परमिशन के आईसीयू वार्ड में घुसने की मनाही होती है ठीक ऐसे ही हम लोगों ने अपने फेसबुक एकाउंट को बना लिया है। यहां हर किसी की अपनी अलग दुनिया है। अपने संगी-साथी और संबंधी हैं। अपनी-अपनी डिजिटल विचारधाराएं हैं। सारे संघर्ष और क्रांतियां भी यहीं हैं।

    मगर यहां असहमति या आलोचना को बर्दाश्त करने की गुंजाइश कतई नहीं है। सामने वाले से अगर आपने अपनी असहमति को जाहिर किया भी, वो या तो आपको ब्लॉक कर देगा या फिर अन-फ्रेंड कर मुक्ति पा लेगा। ये मैं यों ही हवा में नहीं कह रहा। मैंने ऐसा करते तमाम ऊंचे बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, लेखकों को अक्सर ही देखा है।

    फेसबुक पर रहकर हम अपने आप को ‘असुरक्षित’-सा महसूस करते हैं। बहस में अलोकतांत्रिक से हो जाते हैं। हरदम कोशिश यही रहती है कि हमसे सामान विचारधारा वाले मित्र लोग ही जुड़ें। विपरीत विचारधारा वालों के प्रति मन में एक ‘घृणा’ जैसा माहौल रखते हैं।

    सबसे बड़ी समस्या फेसबुक से जुड़े लोगों की यह है कि यहां हर कोई खुद को ‘विद्वान’ समझता है। उस विद्वान से आप न तर्क कर सकते हैं न बहस। विद्वान से पहले उसके चेले ही आपकी इज्जत की ऐसी-तैसी कर डालेंगे। मसला अगर धर्म या जाति से जुड़ा हो तो क्या कहने! इस प्रकार के मसलों का आज सबसे बड़ा अखाड़ा सोशल मीडिया बना हुआ है। हर कोई ऐसे मुद्दों पर लड़ने-भिड़ने को तैयार बैठा है। आप खुद बच सकते हैं तो बचें।

    ऐसा भी नहीं है कि फेसबुक पर कुछ सार्थक नहीं हो रहा। गंभीर-पढ़ा या लिखा नहीं जा रहा। ये सब भी हो रहा है पर हमें दिखाई नहीं देता। दिमाग को हमने इस कदर राजनीति के जालों के बीच उलझाए रखा है कि सार्थक चीजें हमें दिख ही नहीं दे पातीं। वही चौबीस घंटे बेमतलब की राजनीतिक बहसें। और अपने-अपने वैचारिक उल्लू सीधा करने की हसरतें।

    मुझे लगता है, यही कुछ खास राजनीतिक वजहें हैं जिस कारण हमने अपने फेसबुक को सिक्योरिटी का जाल बना डाला है। कि, किसी भी अनजान का यहां प्रवेश करना सख्त मना है।

    महिलाओं का तो समझ में आता है पर पुरुष कब से खुद को असुरक्षित मासूस करने लगे। वे तो इन संसार के राजा हैं। राजा को भला किसका और क्यों डर?

    पहले तो मुझे भी थोड़ा अफसोस रहा था कि क्यों मैंने फेसबुक से अपने दोनों खातों को हमेशा के लिए हटा दिया। मगर उसके बाद यहां के जो अनुभव हासिल हुए तो मुझे लगा कि मैंने ठीक ही किया। सोशल मीडिया के अनुभव भी बहुत जरूरी हैं। आखिर पता तो चले कि डिजिटल होता इंसान अपने व्यवहार और स्वभाव में कैसा होता जा रहा है।

    हम अक्सर कहते हैं न कि देखो दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है। फेसबुक के अनुभव पाने के बाद यह बात अब मुझे सौ फीसद सच साबित होती हुई दिख रही है। अभी आगे और कितना बदलेगी यह आगे देख पाएंगे।

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