हम सब को किसी न किसी से ‘जलना’ अवश्य चाहिए?

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हम सब को किसी न किसी से जरा-बहुत ‘जलना’ अवश्य चाहिए। जलेंगे नहीं तो जिगर में घर जमाए बैठी आग शांत नहीं होगी।

इसीलिए मैं भी जरा-बहुत कभी खुद से तो कभी दूसरों से ‘जल’ लिया करता हूं। सिर्फ जलता ही हूं, ‘भुनता’ नहीं। भुनने में बना सीन रिश्ते खराब करता है।

मूलतः व्यंग्य लिखता हूं तो व्यंग्यकारों से जलता हूं। क्यों न जलूं? उनसे जलना मेरा लोकतांत्रिक अधिकार है। जलकर ही बेहतर लिख पाता हूं। जो लेखक जलकर नहीं लिखता, वो अंधरे कुएं में बैठकर घास छिलता है।

जितने भी ऊंचे व्यंग्यकार हुए, अपने प्रतिद्वंद्वी से जलते थे। न जले होते तो ऊंचे व्यंग्यकार न कहे-माने जाते।

तो जलिए, जितना किसी से जल सकते हैं। बिन जले न आप बेहतर इंसान बन सकते हैं, न काबिल व्यंग्यकार।

…………….

सरकार से संतुष्ट हैं

आप अगर सरकार से संतुष्ट हैं, तो बहुत बड़े मूर्ख हैं। सरकार और नेता से कभी संतुष्ट मत रहिए। रहेंगे तो आगे चलकर बड़े विकट दुख झेलने होंगे।

सरकार से निरंतर सवाल पूछते रहिए। जानता हूं, सरकारें जवाब देने से खुद को बचाती हैं। वे या उनके नेता सिर्फ वोट मांगते वक्त ही ‘लोकतांत्रिक’ होते हैं, जबकि अपने चरित्र में वे ‘घोर अलोकतांत्रिक’ होते हैं। तानाशाहों से भी बदतर।

देख रहा हूं, जब से ‘टाइम’ वाला इंटरव्यू मंजरे-आम हुआ है, सरकार से निजी स्नेह रखने वाले पत्रिका और पत्रकार के खिलाफ हो गए है। क्यों भाई? क्या पीएम खुदा हैं कि न उनसे कोई सवाल पूछ सकता है, न उनके विरुद्ध कुछ लिख सकता है?

कम से कम वो पत्रकार यहां के पत्रकारों से तो बड़े जिगर वाला ही है। यहां के पत्रकार तो कभी इस कभी उस नेता और पार्टी को ही ‘खुश’ करने में लगे हैं आजकल। कोई मोदी का इंटरव्यू लेकर ‘क्रांतिकारी’ हो जाना चाहता है तो कोई राहुल का इंटरव्यू लेकर ‘अति-क्रांतिकारी’। जबकि हैं सभी एक ही थाली के चट्टे-बट्टे।

मेरा लगाव तो इनमें से किसी के भी प्रति नहीं।

  • अंशुमाली रस्तोगी के वॉल से

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