वैज्ञानिक रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करने पर कर रहे काम
केले के टिश्यू कल्चर पौधों से खेती करना अधिकांश जगह वरदान सिद्ध हुआ। परंतु कई स्थानों पर यह पनामा विल्ट रोग को फैलाने के लिए उत्तरदाई भी पाया गया है। इससे पूरी केले की फसल बर्बाद हो जाती है लेकिन अब बहुत जल्द ही इस रोग से मुक्ति के लिए किसानों को तकनीकी उपलब्ध होने वाली है। इस संबंध में कृषि वैज्ञानिक टिश्यू कल्चर के पौधों में ही इस बीमारी से लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न करने में जुटे हुए हैं।
इस संबंध में केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेड़ा, लखनऊ के निदेशक डॉक्टर शैलेन्द्र राजन ने बताया कि पौधों को प्रारंभिक अवस्था में ही आईसीआर टेक्नोलॉजी द्वारा उपचारित करके बचाया जा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा टिश्यू कल्चर पौधों के लिए प्री इम्यूनाइजेशन तकनीक का विकास किया जा रहा है। इस तकनीक के उपयोग से टिश्यू कल्चर पौधों में इस बीमारी से लड़ने के लिए प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न हो जाती है। यह तकनीकी 2 वर्ष में किसानों तक पहुंच जाएगी। केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान केले की नर्सरी में इस बीमारी से बचाव के लिये किसानों प्रशिक्षण प्रदान करता है।

टिश्यू कल्चर में जरा सी असावधानी पनामा विल्ट फैलने का रहता है खतरा:
डॉक्टर शैलेन्द्र राजन ने बताया कि परंपरागत ढंग से केले के पुत्तिओं द्वारा नए बाग़ लगा कर शायद हज़ारों हेक्टेयर क्षेत्र में केले की खेती करना असंभव था। टिश्यू कल्चर पौधों का उपयोग दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है परंतु जरा सी असावधानी केले की पनामा विल्ट नामक महामारी को उन स्थानों पर फैलाने के लिए काफी हैं जहां रोग का नामोनिशान नहीं था। उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों की करोड़ों रुपए की फसल इस बीमारी से नष्ट हो रही है। अधिकतर स्थानों पर सिंचाई के पानी के साथ इस बीमारी के जीवाणु एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैल गए और किसानों को कई वर्षों बाद ज्ञात हुआ कि उनके खेत में यह भयानक बीमारी घर कर चुकी है। नहर एवं बाढ़ के पानी ने इस बीमारी को फैलाने में मुख्य भूमिका निभाई, जहां पर यह बीमारी न थी वहां पर भी टिशु कल्चर पौधे से फैलने की संभावना बढ़ गई है ।
हार्डेनिंग नर्सरी में पनामा विल्ट से पौधों के संक्रमित होने की संभावना:
उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश और बिहार के केला उत्पादकों के लिए टिशू कल्चर पौधे एक वरदान के समान है। इतने बड़े क्षेत्र में केला उत्पादन के लिए परंपरागत तरीके से कम समय में नए बाग लगाने की संभावनाएं बहुत कम है। उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रतिवर्ष करोड़ों टिश्यू कल्चर पौधों की आवश्यकता होती है इसलिए यह कई कम्पनियों के लिए एक लाभकारी व्यवसाय है। गत कुछ वर्षों में केले में हो रही पनामा विल्ट महामारी पर अध्ययन करने के बाद पता चला कि इस बीमारी के बहुत से नए स्थानों प्रकट होने का मुख्य कारण संक्रमित टिशु कल्चर पौधे हैं। भले ही प्रयोगशाला के टिशु कल्चर पौधे रोगमुक्त हो परंतु हार्डेनिंग नर्सरी में इस बीमारी से पौधों के संक्रमित होने की संभावना रहती है।
किसानों को विशेष सावधानी की जरूरत:
डॉक्टर राजन ने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा उत्तर प्रदेश एवं बिहार में यह पाया गया कि यह बीमारी रोग ग्रस्त क्षेत्रों में स्थापित टिश्यू कल्चर हार्डेनिंग नर्सरी से पौधों के कारण फैली, लेकिन कई दूरस्थ स्थान, जिनके आसपास इस बीमारी का नामोनिशान न था। इस बीमारी से ग्रसित पाए गए। किसानों से जानकारी प्राप्त करने के बाद पता चला की उनको रोग ग्रस्त क्षेत्रों से पौधे सप्लाई किए गए। सीतामढ़ी (बिहार) में बाराबंकी की प्रतिष्ठित नर्सरी द्वारा सप्लाई किए गए पौधों द्वारा बीमारी फैलने की सम्भवना व्यक्त की गयी है। इस समस्या से बचने के लिए किसानों में विशेष सावधानी एवं जागरूकता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि उनके द्वारा लगाए जा रहे टिशु कल्चर पौधे संक्रमित क्षेत्रों की हार्डनिंग नर्सरी से तो नहीं आ रहे हैं।







