नई दिल्ली, 4 जुलाई : सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है। अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को निलंबित करने का कड़ा कदम उठाया, जिसे पाकिस्तान ने “युद्ध की कार्रवाई” के रूप में देखा। पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर की धमकी, जिसमें उन्होंने भारत के इस कदम को अस्वीकार्य बताया और दक्षिण एशिया में भारतीय प्रभुत्व को खारिज किया, दोनों देशों के बीच तनाव को और गहरा करती है।
बता दें कि पिछले सप्ताह स्थायी मध्यस्थता न्यायालय द्वारा अपने पक्ष में दिए गए फैसले के बाद, पाकिस्तान अब भारत से द्विपक्षीय जल बंटवारे संधि के कार्यान्वयन को फिर से शुरू करने का आह्वान कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि फैसले से इस्लामाबाद की कानूनी स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन नई दिल्ली द्वारा संधि का पालन करने की संभावना नहीं है। 65 साल पुरानी सिंधु जल संधि पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों के पानी पर अधिकार देती है, जबकि भारत को रावी, सतलुज और ब्यास नदियों पर नियंत्रण प्रदान करती है।
अप्रैल के महीने में जम्मू कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के जवाब में भारत ने सिंधु जल संधि को निरस्त करने की घोषणा कर दी थी। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने गीदड़ भभकी देते हुए कहा कि इस्लामाबाद दक्षिण एशिया में किसी भी तरह के भारतीय प्रभुत्व को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करेगा।
क्या भारत पानी रोक सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के लिए पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का पानी पूरी तरह रोकना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है। भारत के पास मौजूदा बुनियादी ढांचे के साथ पानी का केवल एक हिस्सा ही रोका या मोड़ा जा सकता है। हालांकि, भारत ने तीन-चरणीय योजना (लघु, मध्यम, दीर्घकालिक) बनाई है, जिसमें बांधों की क्षमता बढ़ाकर पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की रणनीति शामिल है।
हालांकि, 30 अप्रैल 2025 तक सैटेलाइट इमेजरी और डेटा से पता चलता है कि पश्चिमी नदियां सामान्य रूप से बह रही थीं। फिर भी, हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने का निलंबन और पानी के प्रवाह में अनिश्चितता पाकिस्तान की कृषि और बाढ़ प्रबंधन को प्रभावित कर सकती है।
- पाकिस्तान के लिए संभावित प्रभावकृषि और अर्थव्यवस्था: पाकिस्तान की 80% कृषि भूमि और 90% खाद्य उत्पादन सिंधु बेसिन पर निर्भर है। पानी की कमी से भुखमरी या बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
- कानूनी और कूटनीतिक कदम: पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों, जैसे विश्व बैंक और PCA, के जरिए भारत के फैसले को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है।
- सैन्य तनाव: मुनीर की धमकी और पाकिस्तान के अन्य नेताओं (जैसे बिलावल भुट्टो) के बयानों से सैन्य टकराव की आशंका बढ़ी है।
भारत ने कहा : आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति का हिस्सा
भारत का कहना है कि संधि का निलंबन आतंकवाद के खिलाफ उसकी जीरो टॉलरेंस नीति का हिस्सा है। विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी जैसे लोग इसे दुनिया की “सबसे उदार जल-बंटवारा संधि” मानते हैं, जिसका भारत को कोई खास लाभ नहीं मिला। भारत ने न केवल संधि को निलंबित किया, बल्कि पाकिस्तानी उच्चायोग के कर्मचारियों की संख्या घटाने और हवाई क्षेत्र बंद करने जैसे कदम भी उठाए।
भारत के सिंधु जल संधि को निलंबित करने के फैसले ने पाकिस्तान में गंभीर चिंता पैदा की है, क्योंकि यह उसकी अर्थव्यवस्था और आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है। असीम मुनीर की धमकी और पाकिस्तान की कानूनी चुनौतियां तनाव को और बढ़ा रही हैं। हालांकि, भारत के लिए पानी को पूरी तरह रोकना अभी तकनीकी रूप से संभव नहीं है, लेकिन दीर्घकालिक योजनाएं इस दिशा में इशारा करती हैं। दोनों देशों के बीच हालिया युद्धविराम (मई 2025) के बावजूद, यह मुद्दा दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है।
हालांकि, विश्वविद्यालय के अधिकारियों और शिक्षकों से बात करते हुए मुनीर ने कहा कि भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित करना एक बुनियादी सीमा को पार करना है जिसे पाकिस्तान बर्दाश्त नहीं कर सकता। सैन्य नेता की यह टिप्पणी दोनों देशों द्वारा कई दिनों तक चले भीषण सैन्य टकराव बाद युद्ध विराम लागू करने के कुछ सप्ताह बाद आई है। मुनीर ने इस बात पर जोर दिया कि जल अधिकारों पर पाकिस्तान की स्थिति एक ऐसे सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करती है जो देश के 240 मिलियन नागरिकों की जीवन-यापन संबंधी जरूरतों से सीधे जुड़ा हुआ है।






