बकरीद: अल्लाह को प्यारी है कुर्बानी

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त्याग और बलिदान के पर्व बकरीद को लेकर राजधानी लखनऊ समेत समूचे उत्तर प्रदेश में तैयारियां चरम पर हैं। इस बार यह त्यौहार 22 अगस्त को मनाया जाएगा। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक 12 महीने जिल हिज्जा की 10 तारीख को बकरीद मनाई जाती है। यह तारीख रमजान के पवित्र महीने के खत्म होने के लगभग 70 दिनों के बाद आती है।

विश्व में इस त्यौहार को ईद उल अजहा और भारतीय उपमहाद्वीप में इस त्यौहार को बकरीद के नाम से जाना जाता है। गैर मुस्लिम समुदाय के बीच बकरीद में कुर्बानी चर्चा का विषय बना रहता है, जबकि इस्लाम में अल्लाह की राह में कुर्बानी का खास महत्व है।

बकरीद के अवसर पर इस्लामी कानून के अनुसार हलाल चौपाय जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। बकरीद के अवसर पर दी जाने वाली कुर्बानी को सुन्नते इब्राहिमा भी कहते हैं। हजरत इब्राहिम पैगंबर थे। एक मान्यता के अनुसार अल्लाह ने उनके सपने में आकर आदेश दिया कि वे अपने बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी दें।

उन्होंने अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए अपनी आंखों में पट्टी बांधकर अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई और आंख खोलकर देखा तो पाया कि उनके बेटे के स्थान पर एक भेड़ कटी हुई है। इसके बाद अल्लाह के हुक्म पर इंसानों की नहीं जानवरों की कुर्बानी देने का इस्लामिक कानून शुरू हो गया। कुर्बानी के बाद बकरे के गोश्त को चार हिस्सों में बांटा जाता है। जिनमें तीन हिस्से गरीब और जरूरतमंद लोगों को के लिए निकाल दिया जाता है। जबकि चौथे हिस्से का इस्तेमाल परिवार और रिश्तेदारों के भोजन के लिए किया जाता है।

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