सितम्बर के महीने में प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी की चारों ओर धूम है क्योंकि इस बार वह ‘गणेश उत्सव’ की धूम में स्वाति और ब्रह्म योग में में आने वाले हैं जो बेहद खास आकर्षण होगा। शहर में ‘गणेश उत्सव’ की धूम में इस बार भक्ति का भोग लगेगा। आरती का आनंद मिलेगा श्रद्धा से शक्ति मिलेगी। प्रेम की पराकाष्ठा होगी। कृपा की कामना होगी। स्वागत का सत्कार होगा और विसर्जन का विषय होगा।
उत्सव में यह तमाम भावनाएं एक रूप होकर सबके प्रिय गणपति के चरणों में समर्पित होंगे। महाराष्ट्र की तर्ज पर यहां लखनऊ में भी लोग साल भर के इंतजार के बाद दिलों में बसी गणपति की मूर्ति को घरों और पंडालों में स्थापित करेंगे। शहर के पंडालों में होने वाले ‘गणेश उत्सव’ में लोग दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं। इस बार भी 13 से 23 सितंबर के बीच यह परंपरा चलेगी। बता दें कि हर दिल में भक्ति वही रहती है पर परिस्थितियों के साथ इस उत्सव की सजावट बदलती रहती है।

कहा जाता है कि गणेश वंदना के साथ ही कोई भी काम शुरू हो, यह परंपरा आदिकाल से हर हिन्दू घर में चली आ रही है। विघ्नहर्ता, विद्धिविनाशक, मंगल मूर्ति आदि नामों से प्रसिद्ध गणेश भगवान की पूजा सिर्फ घरों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में एक राष्ट्रीय पर्व की तरह की जाती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार शिव-पार्वती के पुत्र गणेश जी के जन्म की कथा से पता चलता है कि गणेश का जन्म न होकर निर्माण बल्कि पार्वती जी की शरीर के मैल से हुआ था। स्नान पूर्व गणेश को अपने रक्षक के रूप में बैठा कर वो चली गईं और शिव जी इस बात से अनभिज्ञ थे। पार्वती से मिलने में गणेश को अपना विरोधी मानकर उनका सिर काटकर अपने रास्ते से हटा दिया।
जब वास्तविकता का ज्ञान हुआ तो अपने गणो को उन्होंने आदेश दिया की उस पुत्र का सिर लाओ जिसके ओर उसकी माता की पीठ हो। शिव-गणो को एक हाथी का पुत्र जब इस दशा में मिला तो वो उसका सिर ही ले आए और शिव जी ने हाथी का सिर उस बालक के सिर पर लगाकर बालक को पुनर्जीवित कर दिया। यह घटना भाद्रमास मास की चतुर्थी को हुई थी इसलिए इसी को गणेश जी का जन्म मानकर इस तिथि को गणेश चतुर्थी माना जाता है। सबसे अलग शरीर होने के कारण सभी देवताओं ने गणेश को सभी देवताओं का अग्रज बना दिया और तब से गणेश वंदना हर पूजा से पहले की जाती है।
शहर में ‘गणेश उत्सव’ से ख़ुशी की लहर, स्वाति और ब्रह्म योग में विराजेंगे गणपति बप्पा मोरया
गणेश चतुर्थी पर राजधानी में 13 से 23 सितंबर तक उत्सव मनाया जाएगा। जगह-जगह गणेश पूजा के साथ ही अन्य आयोजन भी होंगे। मूर्तिकार इस बार गणपति को मूषक के अलावा कमल, शेषनाग आदि पर भी विराजमान करवा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के संस्कृत साहित्याचार्य महेंद्र कुमार पाठक के अनुसार चतुर्थ चतुर्थी 12 सितंबर की शाम 6:30 से शुरू हो जाएगी। हालांकि सूर्यास्त 6:01 पर होने के कारण इसका मान 13 सितंबर से लिया जाएगा। 13 को शाम 5:45 पर चतुर्थी रहेगी ऐसे में 5:45 पर सूर्यास्त से पहले पूजा करना उत्तम रहेगा। सर्वोत्तम समय प्रदोष काल रहेगा। प्रदोष काल शाम 4:30 से शाम 5:45 तक मान्य रहेगा।
इस बार पूजन में चंद्रोदय के काल में स्वाति नक्षत्र और ब्रम्हयोग का भी मिलन हो रहा है। इस विशेष योग में दुर्गा के साथ कमल के फूल चढ़ाने प्रकाश महत्व हैं। मूर्तिकार सुजीत पाल के अनुसार बीते साल की तुलना में इस बार जीएसटी में छूट मिलने से मूर्तियों के दामों में कमी आई है।
- नीतू सिंह







