बहना ने भाई की कलाई में प्यार बांधा है.. .

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जी क़े चक्रवर्ती
हमारे भारत देश मे मनाई जाने वाली त्योहारों का एक विशेष महत्व होता है। इस दृष्टि कोण से यदि हम देखें तो वर्ष के बारहों महीने हमारे यहां कोई न कोई त्योहार अवश्य पड़ता है। इसी क्रम में छब्बीस अगस्त 2018 के दिन रक्षाबंधन का त्योहार हमारे देश मे प्रति वर्ष श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाये जाने का प्रचलन है। अभी पिछले जुलाई माह में पड़ी पूर्णिमा गुरु-पूर्णिमा के रूप में मनाया था, जो हमारे गुरु एवं शिक्षकों को समर्पित थी। उससे पहले बुद्ध पूर्णिमा रह चुकी है। इस प्रकार चौथी पूर्णिमा को श्रावण-पूर्णिमा कहते हैं, और यह पूर्णिमा पूरा चाँद भाई-बहन के प्रेम एवं कर्तव्य की भावनाओं से संबंधित होने से रक्षाबंधन के दिन हम लोग अपने बहनों को राखी बांधते हैं, जिसमें भाई बहन एक दूसरे के प्रति प्रेम एवं रक्षा का धागा कहते हैं। रक्षा बंधन एक भाई एवं बहन के मध्य रक्षा के रिश्ते को मजबूत करता है, जहाँ बहनें भाई की रक्षा करतीं वहीं भाई भी अपने बहन की रक्षा करता है।
भविष्य पुराण में ऐसा कहा गया है कि देवाताओं एवं दैत्यों के मध्य एक बार युद्ध छिड़ गया। बलि नाम के असुर ने भगवान इंद्र को हरा दिया और अमरावती पर अपना कब्जा कर लिया था। उस समय इंद्र की पत्नी सची मदद का आग्रह लेकर भगवान विष्णु के पास पहुंची थी। भगवान विष्णु ने सची को सूती धागे से एक हाथ में पहने जाने वाला वलय बना कर देते हुए विष्णु ने सची से कहा कि इसे इंद्र की कलाई में बांध देना। सची ने ऐसा ही किया। उन्होंने इंद्र की कलाई में वलय बांध दिया और सुरक्षा व सफलता की कामना की। इसके बाद भगवान इंद्र ने बलि को हरा कर अमरावती पर अपना अधिकार कर लिया था, उस समय से हमारे देश मे यह धागों का तैयोहार रक्षाबंधन के रूप में मनाया जाने लगा।
 
रक्षा बंधन एक ऐसा त्यौहार है, जहाँ सभी बहनें अपने भाइयों को राखी बांधते हुये कहती हैं “मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी और तुम मेरी रक्षा करो।” और यह कोई आवश्यक नही है कि वे उनके अपने सगे ही भाई ही हों। बल्कि, वे अपने पास पड़ोसी के भाइयों को भी राखी बांधती हैं, और सभी उनके भाई बन जाते हैं। यह प्रथा हमारे देश में बहुत प्रचीन काल से प्रचलित है, और यह पर्व श्रावण पूर्णिमा का एक बहुत बड़ा त्यौहार है। आज ही के दिन यज्ञोपवीत बदला जाता है।
हिन्दू धर्मालंबियों में ऐसी मान्यताएं है कि हमारे कन्धों पर तीन प्रकार की जिम्मेदारियां या ऋण होती हैं – माता-पिता के प्रति ज़िम्मेदारी, समाज के प्रति जिम्मेदारी एवं ज्ञान के प्रति जिम्मेदारी। यह तीनो जिम्मेदारीयों के ऋण जो हम पर होता है उसमे हम अपने माता-पिता के प्रति ऋणी हैं, हम समाज के प्रति ऋणी हैं, और हम अपने गुरु के प्रति ऋणी हैं; यानि ज्ञान के प्रति। इन्ही तीनों प्रकार के ऋणो की जिम्मेदारियों की याद यह यगोपवित्र हमे दिलाता है।
हम जब यह कहते हैं ‘ऋण’– तो हमें लगता है कि ये कोई कर्जा हमारे ऊपर है जो हमें किसी को वापिस भी करना है। हमें इसे एक जिम्मेदारी के रूप में समझना चाहिये। तो इस सन्दर्भ में ऋण का क्या अर्थ है? जिम्मेदारी! यह है अपनी जिम्मेदारियों को पुनः याद करना, पिछली पीढ़ी के प्रति, आने वाली पीढ़ी के लिए और वर्तमान पीढ़ी के लिए और इसीलिए, इस त्योहार में भाई के कलाई पर बहनें धागे को तीन बार लपेटे जाने का नियम हैं।
यही इस तैयोहार का महत्व है– मुझे अपना शरीर शुद्ध रखना है, अपना मन शुद्ध रखना है और अपनी वाणी शुद्ध रखना है; शरीर, मन एवं वाणी की पवित्रता। और जब आपके चारों ओर एक धागा लटका रहता है, तो इस अवस्था मे हमे प्रति दिन ये याद दिलाता रहता है कि – “ओह, मेरी ये तीन जिम्मेदारीयां भी  हैं, जिसको मुझे निभाना हैं।
हमारे भारत में ऐसी अनेकों सच्ची कथाएं हैं जब बहन ने अपने भाई के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया एवं भाई ने बहन को दिए वचन की रक्षा करने के लिए देश, जाती एवं धर्म समस्त प्रकार के बंधनों की परवाह वैगर ही इसकी रक्षा की है। जिसके उदाहरण स्वरूप रानी कर्णवती और हुमायूं के मध्य भाई बहन के रिश्ते की हमारे यहां गाई जाने वाली लोकगीतों में इस घटना का उल्लेख आज भी किया जाता है, जब हुमायूं एक राखी का संदेश पाकर ही अपनी मुंहबोली बहन की रक्षा करने के लिए चला आया था।
यह उस समय की बात है जब हमारे देश के राजा-महाराजा लोग बात-बात पर युद्ध के लिए तत्यपर रहते थे। जिस वक्त चित्तौड़ पर बहादुर शाह ने आक्रमण किया था उस समय रानी कर्णवती विधवा थीं एवं उनके पास इतनी भी सैन्य शक्ति नहीं थी कि वे अपने राज्य की रक्षा कर सकें। एसे वक्त परिस्थियों को भांपते हुए उन्होंने हुमायूं को राखी भेज कर हुमायूं से उनकी मदद करने की प्रार्थना की।  राखी हिंदुओं धर्मालंबियों का पर्व है जबकि हुमायूं मुस्लिम थे, फिर भी उन्होंने राखी की  मान मर्यादा रखते हुए कर्णवती को बहन बनाने का फैसला लेकर उनकी सहायता करने की ठानी और अपना प्रण निभाने के लिए हुमायूं एक विशाल सेना को अपने साथ लेकर चित्तौड़ राज्य की ओर कूच कर गये थे उनदिनों हाथी-घोड़ों पर सवार होकर युद्ध करने की परम्परा थी। सेना को साथ लेकर सैकड़ों किमी की दूरी तय करना इतना सहज नहीं हुआ करता था।
हुमायूं जब तक चित्तौड़ पहुंते-पहुंचते तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 8 मार्च 1535 को रानी कर्णवती ने चित्तौड़ की वीरांगनाओं के साथ जौहर कर अग्नि में समाकर अपने प्राणों की आहुति दी और बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर कब्जा कर लिया।
जब यह समाचार बाबर तक पहुंची तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने बहादुर शाह पर हमला बोल दिया। इस युद्ध मे हुमायूं को विजय मिली और उसने पूरा शासन रानी कर्णवती के बेटे विक्रमजीत सिंह को सौंप दिया।
इन सभी घटना को घटित हिये आज सैकड़ों वर्ष गुजर चुके हैं लेकिन आज जहां नतो सची और नही इंद्र और हुमायूं नहीं हैं और नही कर्णवती लेकिन यह कथा हमारे संस्कृतियों के लेखों -कविताओं के रूप में भाई-बहन का यह पवित्र रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो कर अमर हो गया।
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