भगवान गणेश जी का जन्म गणेश चतुर्थी को हुआ था
गणेश चतुर्थी को भारत के विभिन्न हिस्सों में अनेकों रूपों में मनाई जाती है। हिन्दू धर्म के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में इस त्योहार को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
महाराष्ट्र और उसके आसपास के इलाकों में तो गणेश चतुर्थी के बाद 10 दिनों तक लगातार गणेशोत्सव मनाया जाता है। भक्त इस दौरान अपने-अपने घरों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर भक्ति भाव से दस दिनों तक विघ्नहर्ता श्री गणेश की पूजा करते हैं।
गणेशोत्सव के अंतिम दिन यानि अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
इस बार गणेश चतुर्थी 13 सितम्बर को है। यह चतुर्थी साल भर के चतुर्थियों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और सम्पन्नता आती है। मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत रखने से भगवान गणेश भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
शिवपुराण में एक कथा है कि एक बार माता पार्वती स्नान करने के लिए जा रही थी। उसी समय उन्होंने अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न किया और घर का पहरेदार बनाकर उस बालक को कहा कि मेरे आने से पहले कोई घर में प्रवेश ना करे।
कुछ ही समय बाद शिवजी ने जब घर में प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर शिव के गणों ने बालक से भयंकर युद्ध किया लेकिन संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अंततः भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया। इससे माता पार्वती क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली।
भयभीत देवताओं ने देवर्षि नारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया। शिवजी के निर्देश पर विष्णु जी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले हाथी का सिर काटकर ले आए। भागवान शिव ने गज के उस मस्तक को बालक के धड़ पर रखकर उसे फिर से जीवित कर दिया।
माता पार्वती ने खुश होकर उस गजमुख बालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में श्रेष्ठ होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को देवताओं के अध्यक्ष के रूप में घोषित करके सबसे पहले पूजे जाने का वरदान दिया।
भगवान शंकर ने बालक से कहा कि हे गिरिजानन्दन! विघ्न-वधाओं को नाश करने में तुम्हारा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जाओ।
हे गणेश्वर! तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के बाद व्रती चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए। तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे। श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।







