ये कहानी है एक ऐसी महिला की, जिसने अपने हौसले, संकल्प और ज़िद्द से न सिर्फ़ अपने सपनों को सच किया, बल्कि इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिख दिया। तमिलनाडु के एक आदिवासी परिवार में जन्मीं श्रीपति जी की जिंदगी चुनौतियों से भरी थी, लेकिन उनके इरादे पहाड़ों से भी ऊँचे थे। उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किलों के सामने हार मान लेता है।
श्रीपति जी की जिंदगी का सबसे प्रेरणादायक पल तब आया, जब उन्होंने अपने नवजात शिशु को जन्म देने के महज दो दिन बाद, 250 किलोमीटर का लंबा और थकाऊ सफर तय किया। उनका मकसद था जज बनने का सपना पूरा करना। ये वो समय था, जब कोई और शायद परिस्थितियों के सामने घुटने टेक देता, लेकिन श्रीपति जी ने अपनी ज़िद्द को अपनी ताकत बनाया। न तो उन्होंने अपनी शारीरिक थकान को आड़े आने दिया, न ही सामाजिक बंधनों को। वो बस अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती चली गईं।

परीक्षा कक्ष में कदम रखते ही उन्होंने साबित कर दिया कि अगर मन में ठान लिया जाए, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। उनकी मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प का नतीजा था कि वो न सिर्फ़ परीक्षा में सफल हुईं, बल्कि तमिलनाडु की पहली आदिवासी महिला जज बनकर इतिहास रच दिया। ये उपलब्धि केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं थी, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल थी, जो अपने हालात को अपनी कमज़ोरी समझ बैठते हैं।
श्रीपति जी की कहानी में सबसे खास बात उनकी मानसिकता है। उन्होंने न तो अपनी जिंदगी से शिकायत की, न ही परिस्थितियों पर गुस्सा जताया। उनके लिए हर चुनौती एक अवसर थी, जिसे उन्होंने दोनों हाथों से थामा। उनकी ज़िद्द थी कि उन्हें जज बनना है, और इस ज़िद्द ने उन्हें उस मुकाम तक पहुँचाया, जहाँ वो आज हैं।
कौन हैं श्रीपति जी?

श्रीपति (V. श्रीपति) तमिलनाडु की पहली आदिवासी महिला सिविल जज हैं। मात्र 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने तमिलनाडु पब्लिक सर्विस कमीशन (TNPSC) की सिविल जज परीक्षा पास की, जो 2023 में आयोजित हुई थी। वे मलयाली आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं और नवंबर 2023 में अपनी बेटी को जन्म देने के महज दो दिन बाद चेन्नई में 250 किमी का सफर तय कर परीक्षा दीं। उनकी यह उपलब्धि सामाजिक न्याय और महिलाओं की प्रेरणा का प्रतीक बनी है।
कहाँ की निवासी हैं?
वे तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिले के पुलियुर गाँव (जवाधु पहाड़ियों के पास) की निवासी हैं। उनका मूल स्थान येलागिरी पहाड़ियाँ (तिरुपत्तूर जिला) है, जो एक दूरस्थ आदिवासी क्षेत्र है जहाँ सुविधाओं की कमी है।
शिक्षा दीक्षा किन हालातों में हुई?
श्रीपति ने तमिल माध्यम में शिक्षा प्राप्त की, जो सरकारी नीतियों (जैसे तमिल मीडियम एक्ट) के कारण उन्हें आरक्षण का लाभ दिलाई। वे पहली पीढ़ी की स्नातक हैं। तैयारी के दौरान वे गर्भवती थीं और शादी के बाद ससुराल (चेन्नाम शहर के पुलियुर गाँव) में रहकर पढ़ाई करती रहीं। परीक्षा से ठीक पहले डिलीवरी होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उनकी शिक्षिका महालक्ष्मी ने मार्गदर्शन दिया।
- चुनौतियाँ: गरीबी, आदिवासी पृष्ठभूमि, पहाड़ी इलाके की कठिनाइयाँ और मातृत्व।
- परिवार के सदस्य: पिता: कलिदास (Kalidas) – परिवार का सम्मान बढ़ाने पर गर्व व्यक्त किया।
- पति: एस. वेंकटेशन (S. Venkatesan) – एम्बुलेंस ड्राइवर, जिन्होंने उनकी महत्वाकांक्षाओं का पूरा समर्थन किया।
- माता: नाम उपलब्ध नहीं, लेकिन उन्होंने श्रीपति के सपनों को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- बच्चे: एक बेटी (नवजात, परीक्षा के समय जन्मी)।
(तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने उनकी उपलब्धि की सराहना की और ड्रविड़ियन मॉडल की नीतियों का श्रेय दिया। यह कहानी हौसले और संकल्प की मिसाल है!)
यूजर ने उनके हौसलों के सम्मान में लिखा :
राज ने उनके हौसलों को देखते हुए लिखा : श्रीपति जी की ये कहानी तो दिल को छू गई! बच्चे को जन्म देने के सिर्फ दो दिन बाद 250 किमी का सफर, वो भी जज बनने की जिद के साथ—ये तो सच्ची ताकत है। आपने न सिर्फ इतिहास रचा, बल्कि हर उस इंसान को संदेश दिया कि हौसला हो तो कोई बाधा बड़ी नहीं। सलाम आपको! जियो, जज्बे से जीतते रहो!
इमरान : श्रीपति की हिम्मत ओर संकल्प को सलाम कि वह डिलीवरी के दो दिन बाद 250 किलोमीटर का सफर तय करती हैं और तमिलनाडु की पहली महिला जज बनती हैं। इरादे मज़बूत हो तो आप हर परिस्तिथि में मंजिल पर पहुंच जायेंगे
यौसिफ जमील ने लिखा : श्रीपति ने यह साबित कर दिया है कि महिलाएं कमजोर नहीं होती हैं और ना ही शादी और बच्चे कामयाबी में बाधा बनते हैं।
फ़लज़ा पठान ने लिखा : सैल्यूट हैं इस बहन को, श्रीपति जी ने साबित कर दिया कि हौंसला, मेहनत और अटूट संकल्प के आगे कोई बाधा टिक नहीं सकती परिस्थितिया चाहे जैसी भी हों, अगर इरादा मजबूत हो तो मंज़िल जरूर मिलती है।
श्रीपति जी का प्रेरणा संदेश:
श्रीपति जी की कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी में कोई भी सपना असंभव नहीं है। अगर आपके पास हौसला, मेहनत और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट विश्वास है, तो आप दुनिया की किसी भी बाधा को पार कर सकते हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि हालात चाहे जैसे हों, अगर आप ठान लें, तो आपका सपना हकीकत बन सकता है।
श्रीपति जी की जिंदगी एक जीता-जागता उदाहरण है कि असल ताकत हमारे भीतर होती है। उनकी कहानी हमें प्रेरित करती है कि हम अपनी कमज़ोरियों को अपनी ताकत बनाएँ और अपने सपनों को हकीकत में बदलें। वो एक ऐसी मशाल हैं, जो हर उस इंसान के लिए रास्ता रोशन करती हैं, जो अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहता है। – प्रस्तुति : नीतू सिंह






