अरविन्द कुमार साहू
कुछ मामलों में इस लोकतांत्रिक देश का विपक्ष और मीडिया भी इतना गैर जिम्मेदार है कि वह देश के लिये कब खतरा बन जायेगा, उसे खुद समझ नही आता। विपक्ष जिस तरह दबाव डालकर रक्षा तैयारियों पर सरकार को घेरता है और उससे दुश्मनों की तरह ललकार- ललकार कर सवाल पूछता है, उसके बाद भारी दबाव में सरकार द्वारा दिये गये जवाब सीधे दुश्मन की जानकारी और तैयारी में वृद्धि कर देते हैं।
इसी प्रकार इस देश का अति उत्साही व उतावला मीडिया जिस प्रकार ग्राउंड रिपोर्ट के नाम पर राई रत्ती की खबर सारी दुनिया में प्रसारित कर रहा है, एक – एक बात को जिस आसान तरीके से आम जनता तक जानकारी पहुँचाने के लिये विस्तृत खबरें देता है, मुझे लगता है कि वह आम जनता को कम और दुश्मन को ज्यादा चाक चौबंद कर दे रही है। जिस तरीके से हमारा दुश्मन आँख नाक और कान खोले चौतरफा से चौकन्ना बैठा है, उसे अपने जासूसों की ज्यादा जरुरत ही नही पड़नी है।
इस धुवाँधार मीडिया बाजी का ताजा हाल या यूँ कहें कि दुष्परिणाम यह निकला है कि विगत दिवस सैन्य प्रमुख के साथ और पीछे पीछे गये खबरियों ने सीमा पर भारतीय सेना की तैयारियों और तैनाती के जो सजीव विडियो बनाकर प्वाईंट टू प्वाईंट प्रसारित किये हैं, उन्हें देखकर चौकस चीन ने सभी संवेदनशील व सम्भावित युद्ध क्षेत्रों में अपनी कमजोरी भाँपते हुए जवाबी तैयारियों के साथ लगभग दस हजार सैनिकों सहित अनेक घातक हथियारों की ताबड़तोड़ तैनाती बढ़ा दी है, जो भारत की चुनौती को और संघर्ष पूर्ण बना रही है।
ऐसा नही है कि भारत की तैयारियों का चीन को कुछ भी पता नही है लेकिन जिस जानकारी के लिये चीन को एडी चोटी का जोर लगाना पड़ता और काफी समय बर्बाद करना पड़ता, जब उसे यह सारी जानकारी भारत के मीडिया से ही सजी सजायी थाली के रूप में परोसा हुआ तैयार मिल जा रहा है तो उसके जासूसों का काम आसान हो ही जायेगा। भारत की इन्च इन्च गतिविधियों पर बाज की नजर लगाये चीन खुश हो रहा होगा, जिससे वह सीमा पर भारत के खिलाफ और भी संघर्षपूर्ण स्थितियों के लिये अपने को अनायास भी मजबूत करता जा रहा हैं ।
देश की आम जनता पूछती है कि क्या अब भी वह समय नही आया जब सेना और सरकार से कुछ ज्यादा ही सवाल पूछने वाले ऐसे विपक्ष और युद्ध के लिये उतावले मीडिया की जुबान पर कुछ जरुरी अंकुश लगा दिया जाना चाहिये। क्योंकि युद्ध से अंतत: अपने देश का भी भारी नुक्सान होगा, जिसका असर आम जनता सहित देश के सभी पक्षों पर पडना तय है । देश के कुछ जागरुक लोगों ने इसकी माँग सरकार और सेना से करनी शुरु कर दी है। अब इस बात का निर्णय सरकार, सेना और न्यायालय स्वत: संज्ञान लेकर करना चाहिये। अभिव्यक्ति की पर्याप्त आजादी तभी तक उचित है जब तक उसकी आँच देश की सुरक्षा तैयारियों तक न पहुँच सके। जय भारत।







