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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    ‘गज़वा ए हिन्द’ का सच जो सामने कभी आने नहीं दिया

    By July 2, 2017 Hot issue No Comments5 Mins Read
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    imaging- sushil doshi
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    Post Views: 744

    जिन लोगों को पाकिस्तान की गंदी और डरावनी हकीकत पता नहीं है उन्हें बटवारे के समय पाकिस्तान से भारत आए भीष्म साहनी द्वारा आंखों देखा मंजर जो उन्होंने अपने तमाम उपन्यास और किताबों में, कहानियों में लिखा है वह पढ़ना चाहिए…गजवा-ए-हिन्द कोई कोरी कल्पना नही है
    भीष्म साहनी और उनके भाई बलराज साहनी किसी तरह सब कुछ अपना गवा कर भारत आ गए भीष्म साहनी उस जमाने में आल इंडिया रेडियो के महानिदेशक थे और उस समय ऑल इंडिया रेडियो का हेडक्वार्टर लाहौर में था। बाद में वह दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो गए और उनके भाई बलराज साहनी मुंबई में अभिनेता बन गए।
    आप भी पढ़िए उनकी कहानी “अमृतसर आ गया है” के कुछ हिस्से
    पहली ट्रेन पाकिस्तान से (15.8.1947)
    अमृतसर का लाल ईंटों वाला रेलवे स्टेशन अच्छा खासा शरणार्थी कैम्प बना हुआ था! पंजाब के पाकिस्तानी हिस्से से भागकर आये हुए हज़ारों हिन्दुओ-सिखों को यहाँ से दूसरे ठिकानों पर भेजा जाता था ! वे धर्मशालाओं में, टिकट की खिड़की के पास, प्लेटफार्मों पर भीड़ लगाये अपने खोये हुए मित्रों और रिश्तेदारों को हर आने वाली गाड़ी में खोजते थे…15 अगस्त 1947 को तीसरे पहर के बाद स्टेशनमास्टर छैनी सिंह अपनी नीली टोपी और हाथ में सधी हुई लाल झंडी का सारा रौब दिखाते हुए पागलों की तरह रोती-बिलखती भीड़ को चीरकर आगे बढेे…थोड़ी ही देर में 10 डाउन, पंजाब मेल के पहुँचने पर जो दृश्य सामने आने वाला था, उसके लिये वे पूरी तरह तैयार थे…. मर्द और औरतें थर्ड क्लास के धूल से भरे पीले रंग के डिब्बों की ओर झपट पड़ेंगे और बौखलाए हुए उस भीड़ में किसी ऐसे बच्चे को खोजेंगे, जिसे भागने की जल्दी में पीछे छोड़ आये थे ! चिल्ला-चिल्ला कर लोगों के नाम पुकारेंगे और व्यथा और उन्माद से विह्ल होकर भीड़ में एक दूसरे को ढकेलकर-रौंदकर आगे बढ़ जाने का प्रयास करेंगे ! आँखों में आँसू भरे हुए एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे तक भाग भाग कर अपने किसी खोये हुए रिश्तेदार का नाम पुकारेंगे! अपने गाँव के किसी आदमी को खोजेंगे कि शायद कोई समाचार लाया हो ! आवश्यक सामग्री के ढेर पर बैठा कोई माँ बाप से बिछड़ा हुआ कोई बच्चा रो रह होगा, इस भगदड़ के दौरान पैदा होने वाले किसी बच्चे को उसकी माँ इस भीड़-भाड़ के बीच अपना दूध पिलाने की कोशिश कर रही होगी….
    स्टेशनमास्टर ने प्लेटफार्म के एक सिरे पर खड़े होकर लाल झंडी दिखा ट्रेन रुकवाई ….जैसे ही वह फौलादी दैत्याकार गाड़ी रुकी, छैनी सिंह ने एक विचित्र दृश्य देखा..चार हथियारबंद सिपाही, उदास चेहरे वाले इंजन ड्राइवर के पास अपनी बंदूकें सम्भाले खड़े थे !! जब भाप की सीटी और ब्रेको के रगड़ने की कर्कश आवाज बंद हुई तो स्टेशन मास्टर को लगा की कोई बहुत बड़ी गड़बड़ है…प्लेटफार्म पर खचाखच भरी भीड़ को मानो साँप सूंघ गया हो..उनकी आँखों के सामने जो दृश्य था उसे देखकर वह सन्नाटे में आ गये थे !
    स्टेशन मास्टर छेनी सिंह आठ डिब्बों की लाहौर से आई उस गाड़ी को आँखें फाड़े घूर रहे थे! हर डिब्बे की सारी खिड़कियां खुली हुई थीं, लेकिन उनमें से किसी के पास कोई चेहरा झाँकता हुआ दिखाई नहीं दे रहा था, एक भी दरवाजा नहीँ खुला.. एक भी आदमी नीचे नहीं उतरा, उस गाड़ी में इंसान नहीँ भूत आये थे.. स्टेशनमास्टर ने आगे बढ़कर एक झटके के साथ पहले डिब्बे का द्वार खोला और अंदर गये.. एक सेकंड में उनकी समझ में आ गया कि उस रात न.10 डाउन पंजाब मेल से एक भी शरणार्थी क्यों नही उतरा था.. वह भूतों की नहीँ बल्कि लाशों की गाड़ी थी..उनके सामने डिब्बे के फर्श पर इंसानी कटे-फटे जिस्मों का ढेर लगा हुआ था.. किसी का गला कटा हुआ था, किसी की खोपड़ी चकनाचूर थी ! किसी की आतें बाहर निकल आई थीं… डिब्बों के आने जाने वाले रास्ते में कटे हुए हाथ-टांगे और धड़ इधर उधर बिखरे पड़े थे.. इंसानों के उस भयानक ढेर के बीच से छैनी सिंह को अचानक किसी की घुटी.घुटी आवाज सुनाई दी ! यह सोचकर की उनमें से शायद कोई जिन्दा बच गया हो उन्होंने जोर से आवाज़ लगाई..”अमृतसर आ गया है यहाँ सब हिंदू और सिख हैं, पुलिस मौजूद है, डरो नहीं”..उनके ये शब्द सुनकर कुछ मुरदे हिलने डुलने लगे.. इसके बाद छैनी सिंह ने जो दृश्य देखा वह उनके दिमाग पर एक भयानक स्वप्न की तरह हमेशा के लिये अंकित हो गया …एक स्त्री ने अपने पास पड़ा हुआ अपने पति का ‘कटा सर’ उठाया और उसे अपने सीने से दबोच कर चीखें मारकर रोने लगी…उन्होंने बच्चों को अपनी मरी हुई माओ के सीने से चिपट्कर रोते बिलखते देखा.. कोई मर्द लाशों के ढेर में से किसी बच्चे की लाश निकालकर उसे फटी फटी आँखों से देख रहा था.. जब प्लेटफार्म पर जमा भीड़ को आभास हुआ कि हुआ क्या है तो उन्माद की लहर दौड़ गयी…स्टेशन मास्टर का सारा शरीर सुन्न पड़ गया था वह लाशों की कतारो के बीच गुजर रहा था… हर डिब्बे में यही दृश्य था। अंतिम डिब्बे तक पहुँचते पहुँचते उसे मतली होने लगी और जब वह ट्रेन से उतरा तो उसका सर चकरा रहा था उनकी नाक में मौत की बदबू बसी हुई थी और वह सोच रहे थे की रब ने यह सब कुछ होने कैसे दिया ? मुस्लिम कौम इतनी निर्दयी हो सकती है कोई सोच भी नहीं सकता था…. उन्होंने पीछे मुड़कर एक बार फ़िर ट्रेन पर नज़र डाली… हत्यारों ने अपना परिचय देने के लिये अंतिम डिब्बे पर मोटे मोटे सफेद अक्षरों से लिखा था…..”यह पटेल और नेहरू को हमारी ओर से आज़ादी का नज़राना है ” !                                           अरुण अग्रवाल जी की वाल से,सौजन्य – संजय त्यागी

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