पेड़ों में पल भर में कर देता है होल, बड़े- बड़े जीव भी डरते हैँ इसकी चोंच से!

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जानते हैँ आज कठफोड़वा (वुडपैकर) के बारे में-

भारत के जंगलों में यूँ तो कई प्रकार के वुडपैकर (कठफोड़वा) मिलते हैं, कोई छोटा तो कोई बड़ा, कोई पीला तो कोई काला, सबके अलग-अलग नाम और विशेषताएं भी हैं, कुछ सम्पूर्ण भारत में मिलते हैं तो कुछ नम और घने जंगलों वाले इलाकों में, कुछ तराई में तो कुछ, पहाड़ी इलाकों में।

फिलहाल मैं जिस वुडपैकर के बारे में आपको बताने जा रहा हूं। वह अमूमन पूरे भारत के जंगली या पेड़ों से भरे इलाकों में मिल जाता है। इसका नाम है लैसर गोल्डनबैक्ड वुडपैकर, है न खूबसूरत पक्षी। थोड़ा बहुत तो आपने कठफोड़वे के बारे में सुना और किताबों में पढ़ा ही होगा। चित्र भी देखे होंगे और अगर आप पेड़ों से घिरे शान्त इलाके में रहते हो तो कठफोडवे को देखा भी होगा।

कई बच्चे हुदहुद को भी कठफोड़वा समझ लेते हैं, वह वुडपैकर से अलग होता है, उसकी चोंच नुकीली और तीखी, पतली होती है। कठफोड़वे की मजबूत मोटी और तीखी। इसका आकार मैना जितना होता है। इसका पीठ वाला हिस्से पर सुनहरा पीला और काले रंग का बड़ा सुन्दर संयोजन होता है। निचले पर पर सफेद और काले रंग की शेडिंग से सजे होते हैं। गर्दन पर भी काली सफेद रेखाएं होती हैं, सर पर बेहद खूबसूरत सुर्ख लाल क्रेस्ट (या क्राउन या कलंगी कह लो) होता है। मादा लैसर गोल्डन बैक्ड वुडपैकर भी लगभग नर जैसी ही होती है। यह ज्यादातर जोड़े में और कभी-कभी अकेला भी दिख जाता है।

कठफोड़वा यानि वुडपेकर का अब बन चुका दुर्लभ नजारा ही बचा है। दिल्ली एनसीआर के प्रदूषण में अपनी जिन्दगी बचाने की जद्दोजहद में वुडपेकर।

दुनियाभर में 180 से अधिक कठफोड़वा प्रजातियां हैं, और इन्हें वन, रेगिस्तान, जंगलों और यहां तक ​​कि शहरी सेटिंग्स सहित कई तरह के निवासों के लिए अनुकूलित किया गया है। हालांकि, कठफोड़वा, ऑस्ट्रेलिया, मैडागास्कर या न्यूजीलैंड में कहीं भी नहीं पाए जाते हैं।

इसे जंगलों में और घने पेड़ों वाले स्थान ही पसंद आते हैं। यह फलों के बागों, शहर के बाहरी इलाकों में दिखाई देता है। खुले पेड़ों के ऊँचे तनों पर ठकठक कर तनों की छाल फोड़कर कीड़े, काले चींटे, बीटल्स खाना इसका प्रिय शगल है। यह तने पर पंजों की गहरी पकड़ के साथ बैठ जाता है, और सूखी छाल छील कर छिपे हुए कीड़े बाहर निकालता है, इस काम के लिये वह पंजों के बल उलटा भी उतर आता है यानि रिवर्स गेयर में।

यह कभी-कभी यह पके फलों का गुदा भी खा लेता है। इसकी आवाज तेज और कर्कश होती है, वह भी जब यह उड़ता है तभी यह तीखी आवाज करता है। इसका प्रजनन काल अर्थात घोंसला बना कर अन्डे देने का समय मार्च से अगस्त तक होता है। यह घोंसला बनाने में कोई खास मेहनत नहीं करता, पेड़ की कोटर या तने पर किसी अन्य पक्षी के खाली घोंसलों का इस्तेमाल कर लिया करता है। मादा लैसर गोल्डन बैक्ड वुडपैकर 3 या 4 अण्डे देती है और दोनों मिल कर अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी निभाते हैं।

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