नैमिषारण्य: क्यों है हिंदुओं का सबसे अधिक पवित्र स्थल, इतिहास जानकर हैरान हो जायेंगे आप!

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नैमिषारण्य: जहां श्रद्धालुओं का लगता है तांता

नैमिषारण्य अर्थात (नीमसार) ऐशबाग लखनऊ जंक्शन से 92 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है नैमिषारण्य में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। यह जगह उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित है। मान्यता है कि यह हिंदुओं के सभी तीर्थस्थल केंद्रों में सबसे अधिक पवित्र है। नैमिषारण्य (नीमसार) का भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, देवी सती और भगवान शिव से जुडीं हिंदू पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है। यह स्थान इस मान्यता के कारण अद्वितीय है कि यहाँ 33 हिंदू देवी देवताओं के मन्दिर हैं। 

पवित्र सरोवर चक्रतीर्थ:

चक्रतीर्थ यह एक गोलाकार सरोवर है, कहा जाता है कि इसके मध्य गोलाकार भाग से बराबर जल निकलता रहता है। इस मध्य के घेरे के बाहर स्नान करने का एक घेरा है। यहीं नैमिषारण्य का मुख्य तीर्थ है। इसके किनारे अनेक मंदिर हैं। मुख्य मंदिर भूतनाथ महादेव का है। चक्रतीर्थ का बड़ी महिमा है।

मान्यता के अनुसार एक बार अट्ठासी हजार ऋषि-मुनियों ने ब्रह्मा जी से निवेदन कि जगत कल्याण के लिये तपस्या हेतु विश्व में सौम्य और शांन्त भूमि का निर्देश करें। उस समय ब्रह्मा जी ने अपने मन से एक चक्र उत्पन्न करके ऋषियों कहा कि इस चक्र के पीछे चलकर उसका अनुकरण करो, जिस भूमि पर इस चक्र की नेमि (अर्थात मध्य भाग) स्वतः गिर जाये तो समझ लेना कि, पॄथ्वी का मध्य भाग वही है, तथा विश्व की सबसे दिव्य भूमि भी वही है। इस परम पवित्र भूमि के दर्शन विना जीव का जीवन भी कभी सफल नहीं होता।

हनुमान गढ़ी:

कहा जाता है कि पाताल लोक में अहिरावण पर अपनी जीत के बाद भगवान हनुमान पहले यहाँ प्रकट हुए थे, इसलिए यह जगह उनके भक्तों के लिए उच्च महत्व रखती है। भगवान हनुमान की पत्थर की नक्काशी वाली एक शानदार मूर्ति है, जिसमें भगवान राम और लक्ष्मण उनके कंधों पर बैठे हैं। मंदिर को दक्षिणेश्वर भी कहा जाता है, क्योंकि भगवान हनुमान की प्रतिमा यहाँ दक्षिण की ओर मुख करके स्थित है।

मिस्रिख तीर्थ या दधीचि कुंड: जब इंद्र ने वरुण देव से सभी तीर्थों से जल लाकर एक कुंड में डालने को कहा:

सीतापुर के नैमिषारण्य से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर मिश्रिख है जोकि ‘दधीचि कुंड’ के कारण प्रसिद्धि है। एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार समस्त देवता और इंद्र वृत्तासुर राक्षस से पराजित हो गए। ब्रह्मा और विष्णु जी ने देवताओं से कहा की वृत्तासुर को पराजित करने के लिए ऋषि दधीचि की हड्डियों से यदि एक वज्र बनाया जाय तभी उस वज्र से इस राक्षस को मारा जा सकता है।


कथा के अनुसार ऋषि दधीचि उस समय घने जंगल में तप में लीन थे और उस स्थान का पता लगा पाना बहुत कठिन था। देवताओं ने भगवान विष्णु से इसमें सहायता का आग्रह किया। इस पर भगवान ने अपना सुदर्शन चक्र फ़ेंक कर कहा कि जहां यह चक्र गिरेगा उसी के पास में ऋषि दधीचि तप करते हुए मिलेंगे । यह चक्र नैमिषारण्य में गिरा जहाँ पर आज भी चक्र तीर्थ है। चक्र की नेमि (धुरी) इस स्थान पर गिरने के कारण ही इस स्थान का नाम नैमिषारण्य हुआ ।

इसके पास में मिश्रिख में ऋषि दधीचि ताप करते हुए मिले। इन्द्रदेव और सभी देवों ने ऋषि से अपनी हड्डियां देने का आग्रह किया जिससे राक्षस वृत्तासुर का वध किया जा सके। ऋषि ने देव कल्याण के लिए यह अनुरोध स्वीकार कर लिया पर कहा कि वह मृत्यु से पहले सभी तीर्थों के जल से स्नान करना चाहते हैं । इंद्र ने वरुण देव से सभी तीर्थों से जल लाकर एक कुंड में डालने को कहा। यह कुंड आज भी मिश्रिख में है। क्योंकि इस कुंड में सभी तीर्थों का जल मिश्रित था अतः इस स्थान का नाम भी मिश्रित पड़ा। अब इस स्थान को मिश्रिख या मिसरिख भी कहते हैं

इन्द्र वृत्र के द्वारा देवलोक से निकाल दिये गये थे। वृत्र केवल एक पवित्र वस्तु के द्वारा मारा जा सकता था, हथियारों से नहीं। विष्णु ने देवराज इंद्रसे प्रसन्न हो उन्हें महर्षि दधीचि से उनकी अस्थियों का अनुरोध करने की सलाह दी ऋषि सहर्ष सहमत हुए।

कहा जाता है कि इंद्र ने उन अस्थियों से वज्र तैयार किया और राक्षस को मार दिया। यह सब 10 किलोमीटर दूर मिस्रिख तक चला, जहाँ एक मंदिर, आश्रम और कुंड (तालाब) घटना को दर्शाता है। दशाश्वमेध घाट यहाँ भगवान राम ने दसवाँ अश्वमेध यज्ञ किया था। यहाँ एक प्राचीन मंदिर है जिसमें भगवान राम, लक्ष्मण, जानकी और भगवान शिव जिन्हें सिद्धेश्वर महादेव कहा जाता है की प्रतिमाएँ हैं।

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