संस्मरण : जय शंकर प्रसाद शुक्ला
मुझे आज भी वह पल याद हैं पहले गांव प्रकृति के अनुकूल होते थे जहां मन पसंद घर होते थे। अब तो जरा सी भी गर्मी बर्दाश्त नही होती, एक जमाने में जेठ की दुपहरी मे सिर पर गमछा डाल कर कई कोस सायकिल यात्रा हो जाया करती थी, तब सड़कों के दोनो ओर काफी घने और छायादार वृक्ष हुआ करते थे, और रास्ते मे तमाम बाग भी होती थी।
मुझे याद है। मई का ही महीना था, बरातियों के लिये चारपाई और बिस्तर का इंतजाम होना था, जो कि उस समय परंपरागत रूप से आसपास के गावों से ही इंतजाम करना होता था, टेंट का प्रचलन न के बराबर था, सिर्फ शामियाना और कुर्सियों को छोड़कर, उस समय मै और मेरे साथ मेरे हमउम्र के लोग हुआ करते थे। दोपहर में ही काफी दूर के गावों से सायकिल पर बिस्तर, हंडा, गैस (पैट्रोमैक्स) लाद कर लाये थे, शौक था सायकिल चलाने का, यही नहीं सिर पर दोनो लोग खटिया भी ढोकर लाये थे, धूप और गर्मी रहती जरूर लेकिन अहसास उतना नहीं होता था जितना आज होता है।

तब तीन दिन की बारात होती थी, जो कि आम के बाग में ही रुकती थी, दूसरे दिन दोपहर में लू चलती रहती और शिष्टाचार का कार्यक्रम होता रहता था। शामियाने में, बाई जी का नृत्य, कटे हुये मेवे, केवड़ा मिले जल को एक शंक्वाकार बड़े से सुराहीनुमा पीतल के पात्र मे भरकर, जिसका अगला भाग अगरबत्ती के स्टैंड की तरह छेददार होता, उसी से बीच बीच में बारातियों पर छिड़काव किया जाता ताकी तरावट बनी रहे, बीच बीच में महरा बड़े से पंखे को चारो तरफ घूम-घूम कर बरातियों पर हांकता रहता, वर पक्ष और वधू पक्ष के गणमान्य व्यक्ति एक दूसरे से साक्षात्कार करते और बौद्धिक तथा सांस्कृतिक आदान प्रदान करते थे।
क्या जमाना था। मुझे याद है बड़े बड़े आम पेड़ों पर लदे थे, कच्चे थे, हमजोलियों के साथ ढेले से तोड़कर उसे आग में भून कर पना बनाया गया था, शाम को पास के खेत में कांकर (एक प्रकार का खरबूजा और खीरे का मिलाजुला स्वरूप) तोड़कर लाये थे, सरकारी ट्यूबवेल मे नहाया गया था, लौकी की बर्फी जिसमे केवड़े की सुगंध, वाह क्या स्वाद था।
गर्मी की ही दोपहरिया थी, रास्ते भर आम के बागों से झींगुर की आवाज कानों में गूंजती रही थी, इक्का-दुक्का जीप और ट्रैक्टर दिखते, कभी कभी राजदूत,एज़दी मोटरसाइकिल या बुलेट से फलाने मूंछ पर ताव धरे जाते दिखे थे, हां बैलगाड़ियां बहुत सी दिखी थीं,, एक पंक्षी जो अक्सर ऊं ऊं ऊं करके बोलता था जिसकी मै नकल उतारते हुये रास्ते भर आया था, खुश भी था क्योंकि जेब में विदाई के 24 रूपये पड़े थे जो उस जमाने मे मेरी सबसे बेहतरीन कमाई थे।
वो बीते दिन वो पल जिसमें कोई जिम्मेदारी नहीं सिर्फ बाल सुलभ उन्मुक्तता और जिज्ञासा भरा मन था उसकी बहुत याद आती है, लगता है कि फिर से उस जिंदगी में वापस चला जाऊं, कितनी सहजता थी, न कोई ढोंग न कोई आडंबर, प्रकृति अवलम्बित जीवन, ऐसा जीवन जहां गर्मी और लू का भी अपना अलग ही आनंद था,, आश्चर्य ये है कि ये अपना अनुभव और संस्मरण मै एयरकंडीशन के कृत्रिम ढंडे तापमान में बैठकर लिख रहा हूँ, क्योंकि अब गर्मी जरा भी बर्दाश्त नहीं होती।
- जय शंकर प्रसाद शुक्ला







