जीते तो जश्न हारे तो ईवीएम

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
विपक्ष के ईवीएम अभियान की अंतिम उम्मीद भी समाप्त हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबन्ध में दाखिल याचिका खारिज कर दी। इतना ही नहीं विद्वान न्यायधीशों ने इस पर तल्ख टिप्पणी भी की है। याचिका को खारिज करते हुए सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि अदालत इस मामले को बार बार क्यों सुने। सीजेआई  ने कहा कि वह इस मामले में दखलअंदाजी नहीं करना चाहते हैं। एक महीने पहले हुई सुनवाई के में सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में पांच बूथ के ईवीएम को वीवीपैट की पर्ची से मिलाने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम को वीवीपैट की पर्ची से मिलाने के अपने इस आदेश में एक से बढ़ाकर पांच कर दिया था।
 अनेक विपक्षी पार्टियों ने ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों के मिलान पर पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट अपना निर्णय सुना चुका था। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे विपक्षी नेता इस मामले को चुनावी प्रक्रिया तक चलाना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पहले वाले निर्णय पर असहमति जताई थी। इसके बाद इन्होंने पुनर्विचार याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसको  खारिज कर दिया। याचिका के सूत्रधार लेलगु देशम प्रमुख चंद्रबाबू नायडू थे। इनकी मांग थी कि पचास प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों की ईवीएम से मिलान का आदेश चुनाव आयोग को दिया जाए। चंद्रबाबू नायडू अपना ज्ञान प्रदर्शित कर रहे थे।
उन्होंने नसीहत के अंदाज में कहा कि  था पारदर्शी चुनाव करना चुनाव आयोग का कार्य है। नायडू के कथन से लगा कि वह यह न बताते तो चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं करता। इसका दूसरा अर्थ यह हुआ कि स्वयं चंद्रबाबू नायडू को बहुमत मिला उसमें पारदर्शिता नहीं थी, या उस समय भी ईवीएम खराब थी। यही दशा कांग्रेस, सपा ,बसपा, तृणमूल कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस आदि की है।
जब इन्हें बहुमत मिला, तब ईवीएम बहुत अच्छी थी, तब इनमें से किसी ने नहीं कहा कि बटन कहीं दबाव वोट कहीं जाएगा, तब किसी ने नहीं कहा कि बैलेट पेपर से चुनाव होने चाहिए। लेकिन जब भाजपा को बहुमत मिलने लगा तो ईवीएम खराब हो गई। इनसे पूंछना चाहिए कि यदि बैलेट पेपर चुनाव में भी भाजपा जीत गई ,तब ये क्या करेंगे। इनके हिसाब से तो दो हजार चौदह में कांग्रेस की सरकार ने ईवीएम में ऐसी गड़बड़ी कराई जिससे उनकी सीट चवालीस हो गई, और भाजपा को बहुमत मिल गया।
कर्नाटक, मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, राजस्थान जीते तो जश्न मनाया गया। कहीं भाजपा जीत जाए तो ईवीएम की सामत। इस अभियान की शुरुआत मायावती ने की थी। पिछले लोकसभा चुनाव में सफाया होने के बाद उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था कि ईवीएम खराब थी। गोया की खराब न होती तो वह प्रधानमंत्री बन जाती। उनके कहने का मतलब भी यही थी कि कांग्रेस की सरकार ने ईवीएम में भाजपा का चुनाव भरवा दिया था। क्योंकि उस समय मनमोहन सिंह की सरकार थी, और उस समय नरेंद्र मोदी केवल गुजरात के मुख्यमंत्री थे।
दो हजार बारह में मायावती मात्र अठासी सीट पर सिमट गई, उस समय  ईवीएम किसनें खराब की थी, इसका खुलासा भी मायावती को करना चाहिए था। लेकिन यह मानना होगा कि मायावती ने इस मुद्दे को ज्यादा नहीं खींचा। किंतु अन्य विपक्षी नेता मायावती द्वारा छोड़े गए मुद्दे को आज तक लादे घूम रहे है। यदि इन्हें अपने मुद्दे पर इतना भरोसा है तो इन्हें स्वयं भी वोट नहीं करना चाहिए। बकौल इनके कोई बटन दबाओ वोट भाजपा को ही जायेगा। ऐसे में क्या इन्होंने भी भाजपा का अपरोक्ष समर्थन किया है।
चंद्रबाबू नायडू की शब्दावली देखिये, हम सिर्फ इतना कह रहे हैं कि लोकतंत्र को बचाया जाए। मतलब चुनाव आयोग जैसी संस्था लोकतंत्र नहीं बचा रही है। यह बेचैनी सिर्फ नायडू और इक्कीस पार्टियों के नेताओं में है। इनकी याचिका में कहा गया था कि वीवीपैट पर्चियों के मिलान में केवल दो फीसदी की वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट की पहले की टिप्पणी का जिक्र करते हुये कहा है कि उसने कहा था कि ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों में औचक मिलान की प्रक्रिया में दो प्रतिशत की वृद्धि से चुनाव प्रक्रिया में जनता का विश्वास नहीं होगा। लेकिन सच्चाई यह कि चुनाव प्रक्रिया पर अविश्वास हारने वाले नेताओं को है। आम मतदाता का चुनाव आयोग पर विश्वास है। वह जानता है कि ईवीएम में गड़बड़ी संभव हो होती तो कांग्रेस, सपा ,बसपा आदि पराजित न होती।
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