नवेद शिकोह
चुनावी सर्वे की एक विधि होती है। बाक़ायदा सैम्पल और एक्सपर्ट्स अनुमान की तस्वीर पेश करते हैं। सर्वे एजेंसीज एक फारमेट पर काम करती हैं। जनता के बीच जाकर बहुत ही परिपक्व तरीके से वोटर्स का मन टटोला जाता है। न्यूज चैनल्स विश्वसनीय और प्रोफेशनल एजेन्सी को हायर करते हैं। नतीजों के बाद जो सर्वे जितना सही साबित होता है उस सर्वे को पेश करने वाला न्यूज चैनल और सर्वे एजेंसी पर दर्शकों/पाठकों का विश्वास बढ़ता है। जाहिर सी बात है कि बिल्कुल गलत साबित होने वाले सर्वे को परोसने वाले चैनलों पर से जनता का विश्वास टूटता होगा। टीआरपी डाउन होती होगी। टीआरपी कम होने से चैनल की व्यवसायिक बैक बोन विज्ञापन मिलना कम होते होंगे। इसलिए पेड न्यूज के दौर में पेड चुनावी सर्वे पेश करने से पहले चैनलों को सौ बार सोचना होता होगा। करोड़ों-अरबों रूपये के पेड झूठे सर्वे दिखाकर बड़ा आर्थिक लाभ भी मिल जाये और बाद में इसके गलत साबित होने पर विश्वसनीयता को ठेस भी नहीं पंहुचे। यानी सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे। ऐसी कोई तरकीब भी निकाली जा सकती होगी।एबीपी न्यूज चैनल ने चुनावी सर्वे के सभी मानकों को किनारे करते हुए एक नया एक्सपेरिमेंट किया। और नये प्रयोग के असलफल होने पर अविश्वास की गुंजाइश टल जाती है। क्योंकि नये प्रयोग का मतलब ही रिस्क होता है।
एबीपी चैनल ने लोकसभा चुनाव के नतीजों की संभावनाओं पर आधारित जो सर्वे दिखाये हैं वो विधिवत नहीं बल्कि प्रयोगात्मक हैं। हर लोकसभा सीट का सर्वे स्थानीय पत्रकारों के अनुमान या उनकी राय पर आधारित हैं। यानी यदि सर्वे गलत साबित हुआ तो सर्वे दिखाने वाला नहीं लोकल पत्रकार गलत थे।
पत्रकारों का अनुमान सर्वविदित होता है। इसलिए एबीपी चैनल से लखनऊ के दो पत्रकार संगठनों ने मांग की है कि जिन स्थानीय पत्रकारों के अनुमान पर ये सर्वे दिखाया गया है उन पत्रकारों का विवरण प्रस्तुत किया जाये। यदि चैनल ऐसा नहीं करता है तो पत्रकार संगठन चुनाव आयोग से मांग करेंगे कि चैनल से उन पत्रकारों का नाम और कार्यस्थल की जानकारी ली जाये जिन स्थानीय पत्रकारों के अनुमान पर आधारित बता कर सर्वे पेश किया जा रहा है।
गौरतलब है कि आरोप लगते हैं कि कुछ चैनल्स किसी ना किसी पार्टी विशेष का माहौल बनाने के लिए झूठ पर आधारित पेड सर्वे दिखाते हैं। लोकसभा चुनाव से पहले औद्योगिक घराने बड़े राजनीति दलों के प्रचार को फाइनेंस करते हैं। शर्त ये होती है कि यदि पार्टी सरकार बनाती है तो सरकारी मशीनरी के संरक्षण में उनका बिजनेस ग्रोथ बढ़ाया जाये। काले को सफेद करने में सरकार सहयोग दे।
चुनावी दंगल पर किस्स किस्म के सट्टे लगते रहे हैं। मैच फिक्सिंग होती रही है। पर्दे के पीछे से राजनीति दलों पर कार्पोरेट खूब पैसा लगाता रहा है। ज्यादातर पैसा प्रचार में लगता है, और इस प्रचार को न्यूज या सर्वे के फार्मेट में ढालने के लिए मीडिया को खरीदा जाता है।
बस इन्हीं बातों से इमानदार मीडिया भी बदनाम होती है। मीडिया को इन बदनामियों से बचाने और बेईमान मीडिया की असलियत सामने लाने के लिये आल इंडिया न्यूजपेपर्स एसोसिएशन ने एबीपी न्यूज चैनल से पूछा है कि किन स्थानीय पत्रकारों के अनुमान पर चैनल ने सर्वे दिखाया है, कृपया अवगत करायें !







1 Comment
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