बहादुर बयानबाजों की कड़वाहट भरी लंतरानी

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चुनाव के इस दौर में अब लगभग सारे नेता साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना रहे हैं और एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए किसी भी नीचता पर उतरे आ रहे हैं उन्हें इस बात का ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता की जनता उनके बारे में क्या सोचेगी, उन्हें तो बस अपने अपशब्द भरे बयानों से चर्चा में रहना पसंद हैं, चाहे वह बयान किसी भी हद तक गलत ही क्यों न हो?

अब देखिये न चुनाव के इस दौर में चुनाव जैसे-जैसे समाप्ति की ओर जा रहा है, वैसे-वैसे नेताओं के बयान ज्यादा कड़वाहट के साथ जाहिर हो रहे हैं। पांचवें चरण के बाद दुर्भावना और कसैले बोल हर सियासी पार्टी की तरफ से दनादन आ रहे हैं। निजी हमले ज्यादा हो रहे हैं। वैसे जहर बुझे बयान भारतीय चुनाव में पहली बार नहीं दिए जा रहे हैं। पहले भी ओछी टिप्पणियों का हमला हर दल के नेता एक-दूसरे पर कर रहे हैं। हां, इस बार यह ज्यादा भद्दा और सतही रूप से सामने आया है। मुद्दों की बात करने के बजाय राजनीतिक दल और उनके नेता अनर्गल बयानों से विपक्षी नेताओं पर बढ़त बनाने की चेष्टा में हैं।

हालांकि राजनीति में नैतिकता का पालन करना, दूसरे दल के नेताओं के प्रति सभ्य और सौम्य तरीके से पेश आना और टीका-टिप्पणियों में मर्यादा की सीमा रेखा पार न करना स्वस्थ लोकतंत्र के गुण हैं। मगर अफसोस कि इसे हर दल का नेता बिसरा रहा है या रौंद रहा है। बसपा प्रमुख मायावती का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पत्नी की आड़ लेकर उन पर हमला करना कहीं से भी न्यायोचित नहीं है। किंतु जब इस पर सवाल उठाए जाते हैं तो यही सवाल तेजी से वापस लौटकर आते हैं कि ‘पहले उन्होंने मर्यादा लांघी’। आखिर इस ‘‘हू-तू-तू’ में लोकतंत्र किस कदर जख्मी हो रहा है, इसकी परवाह किसी को नहीं है। कोई किसी को ‘‘वेश्या’ कह रहा है तो कोई ‘‘नीच’ तो कोई इससे भी बदतर शब्दावली का इस्तेमाल कर रहा है।

यानी गाली-गलौज की एक प्रतियोगिता सी चल पड़ी है। कह सकते हैं कि राजनीति में अभद्र भाषा आहिस्ता-आहिस्ता स्वीकृति की भाषा में बदलती जा रही है। सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रहरी भाषा के स्तर पर सबसे ज्यादा ओछे नजर आ रहे हैं। उनमें अपने पूर्ववर्ती नेताओं के गौरवशाली और विलक्षण अतीत का अंश मात्र भी असर नहीं दिखता है। जब मनभेद के बावजूद पक्ष और प्रतिपक्ष के नेता एक-दूसरे के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते थे। तो कम-से-कम नेताओं को सभ्यता की भाषा कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

बेदाग सांसद या विधायक या पार्टी कार्यकर्ता के रूप में उनकी पूंजी भी तो यही है। असहमति के बावजूद विरोधी नेताओं के प्रति सम्मान का भाव नहीं दिखाने का नतीजा है कि राजनीति और राजनेताओं को लेकर जनता का मन खट्टा होता जा रहा है। यह खाई ज्यादा चौड़ी न हो, इसके वास्ते हर राजनीतिक दलों को अपने आचार-विचार और बोली में हर हाल में संयम बरतनी होगी।

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