पर्यावरण: धरती बचाने सभी आएं आगे

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पंकज चतुर्वेदी

अब तो पर्यावरण पर खतरा धरती के अस्तित्व के लिए चुनौती बन गया है। हर कोई समझ रहा है कि कार्बन की बढ़ती मात्रा से दुनिया का गरम होना भूख, बाढ़, सूखे जैसी विपदाओं को न्यौता है। तापमान ऊर्जा का प्रतीक है।

आधुनिक सुख-सुविधा के साधन बगैर ऊर्जा चलते नहीं। लेकिन इसका संतुलन बिगड़ने का अर्थ है हमारे अस्तित्व पर संकट। वायुमंडल में सभी गैसों की मात्रा तय है और 750 अरब टन कार्बनडाई आक्साईड वातावरण में मौजूद है। कार्बन की मात्रा बढ़ने का दुष्परिणाम है कि जलवायु परिवर्तन और धरती के गरम होने जैसे प्रकृतिनाशक बदलाव हम झेल रहे हैं।

कार्बन की मात्रा में इजाफे से तूफान, कीटों के प्रकोप, सुनामी या ज्वालामुखी जैसे खतरे मंडरा रहे हैं। तेजाबी बारिश की आशंका बढ़ने का कारक भी है कार्बन की बेलगाम मात्रा। इतने विषम हालात का अंदाजा हजारों साल पुराने ग्रंथों के रचयिता साधु-संतों को लग गया था। महाभारत में ‘वनपर्व’ में युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय ऋषि से पूछा कि आपने युगों के अंत में होने वाले अनेक महापल्रय के दृश्य देखे हैं, उसके बारे में बताएंगे। ऋषि ने जो जवाब दिया वह आज के हालत की ही तस्वीर प्रतीत होता है। वे कहते हैं कि पल्रयकाल में सुगंधित पदार्थ की खुश्बु गायब हो जाती है। रसीले पदार्थ स्वादिष्ट नहीं रह जाएंगे। वृक्षों पर फल और फूल बहुत कम हो जाएंगे। उन पर बैठने वाले पक्षियों की विविधता भी कम हो जाएगी। वष्रा ऋतु में जल की वष्रा नहीं होगी। ऋतुएं अपने-अपने समय का परिपालन त्याग देंगी। वन्य जीव, पशु-पक्षी अपने प्राकृतिक निवास की बजाए नागरिकों के बनाए बगीचों और विहारों में भ्रमण करने लगेंगे। संपूर्ण दिशाओं में हानिकारक जंतुओं और सपरे का बाहुल्य हो जाएगा। वन-बाग और वृक्षों को लोग निर्दयतापूर्वक काट देंगे। खेती के संकट, नदी-तालाबों पर कब्जे की बात भी ऋषि ने कही। इसी प्रकार ब्रrावैवर्त पुराण में लोगों के जल्दी बाल सफेद होने से ले कर गंगा के अस्तित्व पर संकट जैसी भविष्यवाणी दर्ज हैं।

जलवायु परिवर्तन, प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का क्या भीषण असर होता है, इसकी बानगी है बुंदेलखंड का टीकमगढ़ जिला। यहां वर्ष 1991-2000 के दशक में कुल 497 दिन बरसात हुई यानी लगभग हर साल पचास दिन। अगले दशक 2001-2010 में यह आंकड़ा 355 दिन हो गया। सन 2011 से अभी तक की औसत बारिश तो बामुश्किल 28 दिन सालाना है। एक तो बरसात घटी, दूसरा पानी की मांग बढ़ी, तीसरा पारंपरिक जल प्रणालियों को समाज ने ही नष्ट कर दिया। परिणाम सामने हैं कि अब इस जिले के गांवों में केवल बूढ़े या महिलाएं रह गई हैं। मवेशी आवारा घेषित कर छोड़ दिए गए। जरा गंभीरता से अतीत के पन्नों का पलट कर देखें तो पाएंगे कि मौसम की यह बेईमानी बीते दशक से कुछ ज्यादा ही समाज को तंग कर रही है।

अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने भी कहा है कि तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि पूर्व के महीनों के रिकॉर्ड को तोड़ रही है। यह पर्यावरण के लिए उत्पन्न होने वाले खतरे का संकेत है। आंकड़े जारी होने के बाद उनका अध्ययन कर भूमिगत तापमान पर अपने ब्लॉग में जेफ मास्टर्स और बॉब हेनसन ने लिखा है कि यह मानव उत्पादित ग्रीन हाउस गैसों के नतीजतन वैश्विक तापमान में लंबे समय में वद्धि की चेतावनी है। मार्च की शुरुआत में प्रारम्भिक नतीजों से सुनिश्चित हो गया है कि तापमान में वृद्धि के रिकॉर्ड टूटने जा रहे हैं। 1951 से 1980 के मध्य की आधार अवधि की तुलना में धरती की सतह और समुद्र का तापमान फरवरी में 1.35 सेल्सियस अधिक रहा है।

कैसी विडंबना है कि धरती की अधिकांश आबादी इन खतरों के प्रति चिंतित है, लेकिन निदान के लिए दूसरों की तरफ देखती है। विकसित देश सोचते हैं कि उनके कल-कारखाने, एयरकंडीशन चलते रहें और विकासशील या तीसरी दुनिया के देश ही वायुमंडल में कार्बन की मात्रा घटाने के लिए कटौती करें। स्थानीय स्तर पर भी वायु प्रदूषण होने के लिए हम सरकार को कोसते हैं लेकिन अपने स्तर पर कुछ नहीं करते जिससे धरती पर जीव के सुखद जीवन में कुछ और सांसें जुड़ सकें। आमजन ऊर्जा की बचत, पानी को गंदा करने से बचने, हरियाली और मिट्टी के संरक्षण का संकल्प ले तो बड़ा बदलाव हो सकता है। छोटे तालाब और कुएं, पारंपरिक मिश्रित जंगल, खेती और परिवहन के पुराने साधन, कुटीर उद्योग का सशक्तीकरण कुछ ऐसे प्रयास हैं, जो कार्बन पर नियंत्रण कर सकते हैं। इसके लिए हमें पश्चिम से उधार में लिये ज्ञान की जरूरत भी नहीं है।

  • पंकज बुक्स ब्लॉगपोस्ट से साभार

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