दिलीप अग्निहोत्री
मनोहर पणिक्कर ने ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया को चरितार्थ किया। सत्ता को काजल की कोठरी कहा जाता है। लेकिन वह आजीवन बेदाग रहे, और इसी रूप में वह सदैव देश की स्मृतियों में रहेंगे। उनका जीवन प्रेरणादायक था। जनसेवा के नाम पर परिवारवाद, भ्रष्टाचारवाद ,जातिवाद में जकड़े नेताओं को खासतौर पर उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।उनका जीवन खुली किताब जैसा रहा। इसमें उनकी ईमानदारी, सादगी, मेहनत, इच्छाशक्ति, कर्तव्यनिष्ठा के अध्याय शामिल है। राजनीति उन्हें विरासत में नहीं मिली थी। वह होनहार विद्यार्थी थे। आईआईटी के डिग्री धारक थे। लेकिन उन्होंने समाजसेवा को महत्व दिया। अरविंद केजरीवाल की तरह कभी यह नहीं कहा कि उन्होंने बड़ा त्याग किया है। सत्ता के लिए अपने को इस रूप में महान साबित करने का प्रयास नहीं किया। यह भी नहीं कहा कि वह नई राजनीति शुरू करने के लिए आये है।
राजनीति में उनका आचरण ही आदर्शों को अभिव्यक्त करने वाला था। अरविंद केजरीवाल की तरह सादगी का वादा नहीं किया। यह नहीं कहा कि वह छोटे वाहन से चलेगे, यह नहीं कहा कि वह मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकारी आवास में नहीं रहेंगे। जब मुख्यमंत्री बने तो बिना ढिंढोरा पीटे यह सहज रूप में कर दिखाया। यह इसलिए संभव हुआ कि उनकी मूल प्रवत्ति में सादगी और ईमानदारी थी। वह बड़ी सहजता से इस पर अमल करते थे। मुख्यमंत्री आवास को जगह वह अपने छोटे से घर में रहते थे। फ्लीट की जगह स्कूटर पर चलना उन्हें पसंद था। अक्सर वह गोवा में चाय की दुकान पर लोगों से बात करते थे, चाय पीते थे। साधारण दर्जे में हवाई यात्रा करते थे। जिसके बारे में कांग्रेस के शशि थरूर ने कैटल क्लास कहा था।
वह नरेंद्र मोदी की तरह दिन रात मेहनत करने वाले व्यक्ति थे। अपने बेटे के विवाह में देर रात तक व्यस्त रहने के बाद वह समय से मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंच गए थे। जबकि कार्यालय के अधिकारी व कर्मचारी यह मान कर बैठे थे कि मुख्यमंत्री आज अवकाश पर रहेंगे। एक अन्य किस्सा भी चर्चित है। वह देर रात तक अधिकारियों के साथ सरकारी कार्य करते रहे। दो बज गए। मनोहर पणिक्कर ने बैठक खत्म की। अधिकारियों को राहत देते हुए कहा कि बहुत देर हो गई। कल आराम से आइयेगा। अधिकारी खुश हुए।
एक अधिकारी ने पूंछ ही लिया, सर कितने बजे तक आ जाएं। मनोहर जी बोले अभी जाइये आराम करिए, सुबह सात बजे तक आ जाइयेगा। यह उनके कार्य करने का तरीका था। कैंसर से पीड़ित और कमजोर हो जाने के बाद भी वह अपने दायित्वों का निर्वाह करते रहे। नाक में नली लगी थी, चलने में कठिनाई थी, फिर भी कार्यालय और विधानसभा सत्र में जाते रहे। इतना ही नहीं बीमारी की इस स्थिति में उन्होंने विधानसभा में बजट प्रस्तुत किया था। इसी शारीरिक स्थिति में वह अनेक निर्माण कार्यो का निरीक्षण करने जाते थे।
रक्षामंत्री के रूप में भी उनका कार्यकाल शानदार रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके साथ मिलकर संकल्प लिया था कि भारत को हथियारों का निर्यातक बनाया जाएगा। मनोहर जी ने इस दिशा में कारगर कदम उठाए। अमेरिका सहित अनेक देशों की उनकी यात्रा भी बहुत उपयोगी साबित हुई थी। नरेंद्र मोदी ने अपने सन्देश में ठीक कहा कि मनोहर पणिक्कर अद्वितीय नेता थे। रक्षामंत्री के रूप में उनकी सेवाओं को पीढियां याद करेंगी।
राजनीति में उन्होंने कभी परिवारवाद को तरजीह नहीं दी। परिवार के लिए अवैध सम्पत्ति का जखीरा तैयार नहीं किया। बड़ी सुरक्षा का तामझाम भी उन्हें पसंद नहीं था।
आजादी के बाद महात्मा गांधी के नाम पर खूब राजनीति हुई। लेकिन उनके विचारों पर अमल दुर्लभ था। महात्मा गांधी ने समाज व आर्थिक जीवन में ट्रस्ट का सिद्धांत दिया था। मनोहर पणिक्कर ने इस पर अमल करके दिखा दिया। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने को गोवा के ट्रस्टी बताया था। मतलब वह अपने को मालिक नहीं सच्चे अर्थों में सेवक और चौकीदार समझते थे। यही कारण था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन पर बहुत विश्वास करते थे। आजादी के बाद से धीरे धीरे राजनीति के सामने विश्वास का संकट बढा है।
प्राइवेट कंपनियों की तरह राजनीतिक पार्टियां बनने लगी। दौलत का साम्राज्य बनाया जाने लगा। जातिवाद के समीकरण से पार्टियां संचालित होने लगी। मनोहर पणिक्कर जैसे राजनेता दुर्भभ होने लगे। उन्होंने राजनीति में चाल, चरित्र, सुचिता को महत्व दिया। अपने जीवन में इन आदर्शों पर अमल करके दिखा दिया। यह साबित किया कि इच्छाशक्ति के बल पर इस कठिन मार्ग पर प्रन्नता पूर्वक चला जा सकता है। मनोहर जी कर्मयोगी और महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर अमल करने वाले थे। उनके यही सब गुण प्रेरणा देते रहेंगे।







