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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    पीओके पर सीधी बात से छूटे पाक के पसीने

    By August 19, 2019Updated:August 19, 2019 Current Issues 1 Comment4 Mins Read
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    वायरल मुद्दा: जी के चक्रवर्ती

    देश के आजादी काल वर्ष 1947 से ही पाकिस्तान ने भारत के इस भुस्वर्ग वाले हिस्से गिलगित-बाल्‍टिस्‍तान पर अपना कब्जा जमा लिया था। उसी वक्त से पाकिस्तान की हमेशा यह कोशिश रही कि इस स्थान को दुनिया से मुख्यतः भारत के नजरों से दूर रख सके, जिससे इससे संबंधित कोई मुद्दा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भारत कभी भी उठा न सके। कश्मीर के इस क्षेत्र में भारत एवं पाकिस्तान के मध्य 3,323 किलोमीटर लंम्बी अंतरराष्ट्रीय सीमा मौजूद है। इस सीमा के आस-पास के क्षेत्र में आज तक हमेशा एक तनावपूर्ण स्थिति बनी रहती है।

    यहां पर पाकिस्तान सरकार की चेतावनी ऐसे समय आई है जब अलगाववादी अवामी एक्शन कमेटी आफ गिलगित-बाल्टिस्तान ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना को वापस लेने के लिए अनिश्चितकालीन हड़ताल का आह्वान किया है। अब पीएम मोदी द्वारा इस क्षेत्र के मसले को उठाए जाने के बाद वहां के स्थानीय आंदोलनों को एक नई आवाज मिली है और लोगों को उम्मीद है कि पाकिस्तान के दमन के खिलाफ अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी आवाज सुनी जाएगी। इधर भारत के रक्षामंत्री के द्वारा दिया गया बयान पीओके पर सीधी बात से पाक के पसीने छूट आये हैं वह चीन से लेकर सयुंक्त राष्ट्र संघ तक गुहार लगा चुका है लेकिन अभी उसे कुछ हासिल नहीं हुआ है।

    गौर करने वाली बात यह है कि वर्ष 2016 में भारत देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में स्वत्रंतता दिवस के अवसर पर अपने भाषण में बलूचिस्तान के साथ-साथ गिलगित-बाल्टिस्तान के मामले का उल्लेख किया था। ऐसा कर उन्होंने रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एक ऐसे क्षेत्र की तरफ देश दुनिया का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराया था। यहाँ यह बताना जरुरी है कि सिंधु नदी को अपने दामन में समेटे इस इलाके में माउंट एवरेस्ट से कुछ ही कम ऊंचाई वाले पर्वत मालाएं हैं। जिसका इतिहास लगभग भुलाया जा चुका है और इसका राजनीतिक भविष्य संदेह के आगोश में चला गया में है। इससे जुड़े कई ऐसे मुद्दे हैं जिसपर पाकिस्तान इस इलाके को लेकर अपने आप को एक असहज स्थिति में महशूस करता है।

    अप्रैल 1949 तक गिलगित-बाल्‍टिस्‍तान,  पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का एक हिस्सा माना जाता रहा है।, लेकिन, 28 अप्रैल 1949 को पाकिस्तान के कब्जे वाले पाकिस्तान कश्मीर की सरकार के साथ एक समझौता हुआ, जिसके तहत गिलगित के मामलों को सीधे पाकिस्तान की केंद्र सरकार के अधीन कर दिया गया। इसी करार को कराची समझौते के नाम से जाना जाता है। लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस क्षेत्र का कोई भी नेता इस करार में शामिल नहीं था।

    पाकिस्तान गिलगित में पैदा होने वाले किसी भी तरह का असंतोष एवं आंदोलनों को सैन्य शक्ति के बलबूते कुचल देता है। गिलगित के सामाजिक कार्यकर्ता सेंगे हसनान सेरिंग ने कहा कि इसकी ताजा मिसाल संघीय योजना मंत्री एहसान इकबाल का वह बयान है, जिसमें उन्होंने यह कहा है कि चीन-पाकिस्तान गलियारे का विरोध करने वालों पर बेहद कड़ा आतंकवाद रोधी कानून लगाया जाएगा। सेंरिंग वाशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट फार गिलगित-बाल्टिस्तान स्टडीज के अध्यक्ष हैं और इस क्षेत्र के प्रतिरोध आंदोलनों के समर्थक भी हैं।
    दस लाख से अधिक की जनसंख्या वाले विवादित गिलगित-बाल्टिस्तान अपने यहां दो दिन स्वतंत्रता दिवस मनाते चले आ रहे हैं। प्रथम तो 14 अगस्त को, जब पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है और दूसरी बार उस दिन जब पहली नवंबर को जब वर्ष 1947 में प्राप्त की गई अपनी आजादी को याद करते है। यह आजादी का समय मात्र 21 दिन तक ही चल पाया था। लेकिन पाकिस्तान अपने दावे के पक्ष में वर्ष1935 की उस लीज डीड का उल्लेख करता है, जिसने ब्रिटिश हुक्मरानों ने 60 वर्षों तक के लिए इस क्षेत्र का नियंत्रण उन्हें दे दिया था।

    वैसे तो कहा जाए तो भारत के पास गिलगित-बाल्‍टिस्‍तान को हासिल करने के विकल्पों की भरमार है, जिनमें कूटनीतिक से लेकर जल एवं आर्थिक सैन्यबल सब कुछ शामिल है, चाहे वो तरीका प्रच्छन्न हो या खुला। भारत की ओर से प्रतिक्रिया कूटनीतिक एवं सैन्य, दोनों ही प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन हमें प्रत्येक विकल्प को नाप- तौल करके ही प्रयोग करना पड़ेगा  कियुंकि हमे पाकिस्तान के किसी भी जाल में फंसना नहीं चाहिए। अब वह समय आ गया है जब हमें भारत के इन दोनों गिलगित-बाल्‍टिस्‍तान जगहों को पाकिस्तान के कब्जे से आजाद कराकर वहाँ के लोगों को खुली हवा में स्वांस लेने की आजदी देने के लिए भारत मे पुनः विलय किया जाना चाहिए।

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    1 Comment

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