सभी 40 लोकसभा सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारने का ऐलान
बस चुनाव का बिगुल बजने वाला है लेकिन राजनितिक दाल इससे पहले है तैयार बैठे हैं बस उनका एक ही लक्ष्य कुर्सी हासिल करना! कई दल तो पहले से ही गठबंधन कर चुके हैं लेकिन कुछ अपने फायदे के लिए अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला कर चुके हैं।
इस बार बिहार में महागठबंधन के रणनीतिकारों का सब कुछ ठीक कर लेने के दावे को सबसे पहले बसपा ने ही आईना दिखा दिया। हालांकि बसपा ने महागठबंधन का घटक दल होने का कोई निर्णय नहीं किया था, लेकिन महागठबंधन के विस्तार की बात के साथ बसपा, सपा और वाम दलों को साथ लेकर चलने की चर्चा होती रही है। कहना नहीं होगा कि राजद व कांग्रेस के बीच इस बात का मंथन जारी था कि बसपा को गोपालगंज, सपा को झंझारपुर व सीपीआई को बेगूसराय लोकसभा चुनाव लड़ा कर महागठबंधन को मजबूती की राह प्रदान की जा सकती है। इतना ही नहीं, इस मजबूती की आधारशिला रखने राजद नेता तेजस्वी यादव, बसपा अध्यक्ष मायावती के जन्मदिन के मौके पर लखनऊ भी गए थे। मगर बहुजन समाजवादी पार्टी ने बिहार की सभी 40 लोकसभा सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर महागठबंधन को जबर्दस्त झटका दे दिया।

महागठबंधन के वोटबैंक में सेंधमारी:
बसपा का जनाधार उत्तर प्रदेश से सटे बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में अधिक है। यह अलग बात है कि बसपा को लोकसभा चुनाव में बिहार से किसी उम्मीदवार को सांसद बनाने का सौभाग्य नहीं मिल सका। लेकिन राज्य के कई विधान सभा क्षेत्रों में उनका प्रभाव रहा है। ऐसे में कई क्षेत्रों में बसपा उम्मीदवार खड़ी करती है, तो वह महागठबंधन के वोटबैंक में सेंधमारी करते ही दिखती है। वैसे भी विधान सभा में बसपा की जो स्थिति रही है, वह महागठबंधन की सेहत के लिए ठीक नहीं है।
1990 के विधानसभा में बसपा ने कुल 164 सीटों पर चुनाव लड़ कर 1.4 प्रतिशत वोट हासिल भी की। हालांकि उन्हें किसी भी विधान सभा सीट पर जीत हासिल नहीं हुई। 1995 के विधानसभा में जरूर बसपा को दो विधान सभा क्षेत्रों में जीत मिली और वोट प्रतिशत बढ़ कर 2.66 जा पहुंचा। बसपा ने तब मोहनिया व चैनपुर विधान सभा में जीत हासिल की थी। 2000 के विधान सभा चुनाव में बसपा ने अपनी किस्मत आजमाई और इस बार पांच विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की और उनका वोट प्रतिशत चार प्रतिशत जा पहुंचा। अक्टूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में भभुआ, दिनारा, बक्सर व कटैया विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी। तब भी इनका वोट प्रतिशत चार से ज्यादा रहा।
महागठबंधन की परेशानी बढ़ी:
2010 व 2015 के विधानसभा चुनाव में सीट भले ही बसपा को नहीं मिली, मगर वोट प्रतिशत तीन के आसपास रहा। इन स्थितियों में अपने वोट प्रतिशत के साथ बसपा महागठबंधन की ताकत बन सकती थी। लेकिन अकेले दम 40 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर उसने महागठबंधन की परेशानी जरूर बढ़ा दी है। यह परेशानी तब और बड़ी हो सकती है, जब हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (से) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी की दृष्टि महागठबंधन के प्रति वक्र रही। समझौता नहीं होने की स्थिति में हम (से) 20 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने की बात कह भी चुकी है।






