आज भारतीय समाज मे तीज त्यौहारो को मनाने का तौर तरीकों में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है। इस दिन को त्यौहारो के रूप में मनाने का अनेकों कारण व रूप होते हैं और जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता चला गया, वैसे वैसे उसमे अनेको तरह के बदलाव आते चले गये। आज पच्चीस जुलाई 2020 में पड़ने वाला नाग पंचमी का त्यौहारो नागों के पूजा कर मनाये जाने की परम्परा पूर्व काल से चली आ रही है वहीं पर कुछ स्थानों पर इस त्यौहारो को गुड़िया के नाम से जाना व मनाये जाने की परम्परा है।
नागपंचमी पर गुड़िया पीटने की अनोखी परम्परा की शुरुआत राजा परीक्षित की मृत्युं से हुई थी।
नागपंचमी के दिन महिलाएँ घर के पुराने कपडों से बनाई गयी गुड़िया को चौराहे पर डालती हैं और बच्चे उन्हें कोड़ो और डंडों से पीट पीट कर खुश होते हैं। इस परम्परा की शुरूआत के बारे में एक कथा प्रचलित है।

महाभारत के समाप्त होते ही पांचो पांडवों ने अपना राजपाठ अपने वंशज राजा परिक्षित को सौंप कर बन को प्रस्थान करते ही पृथ्वी पर कलयुग की शुरुआत हुई है। राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से होंगी ऐसा ऋषी के अभिशाप था और नाग के काटने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई थी। समय बीतने पर तक्षक नाग की चौथी पीढ़ी की एक कन्या राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी के संतती के साथ ब्याही गयी थी। उस कन्या ने अपने ससुराल के एक महिला के सामने यह रहस्य उजागर करते हुये यह कहा कि इसके बारे वह किसी अन्य से जिक्र न करें लेकिन उस महिला ने दूसरी महिला के सामने यह राज खोल दी और इसी तरह उसने दूसरे से इस बात का जिक्र कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि यह बात धीरे-धीरे पूरे नगर में जंगल की आग की तरह फैल गई।
तक्षक नाग के डसने पर राजा परीक्षित की मृत्यु होने की बात का खुलासा हो जाने पर नगर भर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा करके कोड़ों से पिटवा कर मरवा दिया। वह इस बात से क्रुद्ध हुआ था कि इन औरतों के पेट में कोई भी बात नहीं पच पाती है। उसी वख्त से नागपंचमी के दिन कपड़े की गुड़िया के पीटने की परम्परा का जन्म हुआ।
कुछ प्रदेशों के लोग इस दिन को अपने घरों की दीवारों पर नागों एवं साँपों की आकृतियां उकेर कर नागों की पूजा अर्चना इस मनोकामना के साथ करते हैं कि हमारे घर सुख-शांति और समृद्धि आये। इस दिन को नागों का दिन मानने के कारण बहुत से सपेरे नाग को लेकर घर-घर के द्वार पर जाते हैं और लोगों को नाग के दर्शन करवा कर अपने और नाग को दूध पिलाने के वास्ते रुपये मांगते हैं। इसके अलावा इस त्योहार पर अनेक जगहों पर मेले लगते है और कुछ जगह पहलवानो के दंगल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। जिसमें पहलवाने अपने-अपने युद्ध कलाओं का प्रदर्शन करते हैं।








