17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का होगा विरोध, अपने हिस्से के साथ आयें तो होगा स्वागत: संघर्ष समिति

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  • उप्र सरकार 17 अति पिछड़ी जातियों का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा पहले दलितों के 21 प्रतिशत आरक्षण में मिला कर उसे करे 35 प्रतिशत तभी व्यवस्था स्वीकार
  • संघर्ष समिति का ऐलान पहले सभी दलों के नेताओं से मिल कर मांगेगे न्याय कराने का सहयोग न बनी बात तो जुलाई में इस व्यवस्था के विरोध में लखनऊ में होगा विशाल आरक्षण बचाओ पैदल मार्च

लखनऊ,30 जून 2019: आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति ने आज एक आवश्यक बैठक में कहा कि सरकार द्वारा 24 जून को 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के निर्णय के मौजूदा स्वरूप का विरोध किया गया। संघर्ष समिति के नेताओं ने कहा कि प्रदेश का आरक्षण समर्थक इस व्यवस्था को तभी स्वीकार करेगा जब 17 अति पिछड़ी जातियां अपना पूरा हिस्सा लेकर अनुसूचित जाति परिवार में शामिल हों।

उन्होंने कहा कि यह कैसा न्याय कि संविधान प्रदत्त दलितों के अधिकार को निष्प्रभावी बनाने के लिये सरकार ने इस प्रकार का निर्णय लिया है, जिससे आने वाले समय में दलित व पिछड़े वर्ग के भाइयों के सामाजिक गठजोड़ में दरारें भी आयेंगी। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह निर्णय दलित व पिछड़ों को आपस में लड़ाने की साजिश है।

संघर्ष समिति के नेताओं ने कहा कि इसका हर स्तर पर विरोध किया जायेगा। पहले चरण में सभी राजनैतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं से इस मसले पर सहयोग मांगा जायेगा, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से भी जल्द मुलाकात की जायेगी। फिर भी बात न बनी तो आरक्षण समर्थक संवैधानिक तरीके से विशाल पैदल मार्च करेंगे। जुलाई के महीने में विशाल आरक्षण बचाओ पैदल मार्च के लिये सभी जिला संयोजकों को तैयार रहने के लिये कह दिया गया है।

आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति के संयोजकों अवधेश कुमार वर्मा, डा. रामशब्द जैसवारा, अजय कुमार, श्याम लाल, अन्जनी कुमार, एसपी सिंह, दिग्विजय सिंह, श्रीनिवास राव, राजेश पासवान व सुनील कनौजिया ने कहा कि हद तो तब हो गयी जब 24 जून 2019 को 17 अति पिछड़ी जातियों को बिना जनसंख्या के अनुरूप आरक्षण को बढ़ाए उक्त जातियों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र निर्गत किये जाने हेतु जिलाधिकारियों को निर्देश जारी कर दिया गया। जबकि संवैधानिक व्यवस्था यह है कि जिस प्रदेश में अनुसूचित जाति की जितनी जनसंख्या होगी, के अनुरूप ही उस प्रदेश में आरक्षण की व्यवस्था रहेगी।

ऐसे में 17 अति पिछड़ी जातियां जिनकी प्रदेश में जनसंख्या लगभग 14 प्रतिशत है। फिर ऐसे में उप्र की सरकार द्वारा अनुसूचित जाति को मिलने वाले आरक्षण की सीमा लगभग 35 प्रतिशत किये बिना उसमें कोई भी अतिक्रमण किया जाना संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है।

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