आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं लुप्त न हो जाएं पितृपक्ष की परंपरा

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श्राद्ध की परंपरा को बनाए रख हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को रख सकते हैं जीवित

लखनऊ, 06 अक्टूबर 2018: पितृपक्ष, श्राद्ध कर्म भी अब आधुनिकता के रंग में रंग चुके है वह मन से किये गए श्राद्ध कर्म में अब वह सादगी और आपसी व्ययहारिकपन बहुत काम देखने को मिलता है

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध करने की भी विधि होती है। यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो मान्यता है कि वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है। शास्त्र सम्मत मान्यता यही है कि किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के जरिए ही श्राद्ध कर्म (¨पड दान, तर्पण) करवाना चाहिए।

मीडिया में छपी एक खबर के अनुसार गंगापुत्र घाटिया संघ के महामंत्री आनंद द्विवेदी ने बताया कि शास्त्रों में पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध की विशेष महत्ता बतायी गई है। लेकिन आधुनिकता का साया इस पर भी मंडराने लगा है। यजमानों में श्राद्ध के प्रति आस्था, श्रद्धा और पुरानी परंपरा का लोप नजर आने लगा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ‘पडदान का पूजन करने वाले व्यक्ति को नई सफेद धोती-कुर्ता, धोती-बनियान पहना कर और मुंड़न कराकर, जनेऊ धारण करके पूर्वजो को श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। लेकिन इस रीति रिवाज में कुछ ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग ही नजर आते हैं। उन्होंने बताया कि संगम तट पर पितृ ऋण से मुक्ति के लिए किए जा रहे तर्पण एवं पिण्दान में अब यह सब दिखने लगा है। श्राद्ध कर्म कराने और करने वालों के पहनावे से लेकर दान दक्षिणा तक का स्वरूप बदल गया है।

शहरी लोग पैंट-शर्ट पहनकर कर्म करते हैं जो सर्वथा अनुचित है। उन्होंने बताया कि पितृपक्ष का गरूड पुराण में विस्तृत विवरण है। उन्होने बताया कि पहले पितृपक्ष में श्राद्ध कराने वाले ब्राह्मण को घर का बना भोजन श्रद्धा पूर्वक कराते थे। उसके बाद दक्षिणा में सफेद धोती, बनियान, गमछा, जनेऊ, तुलसी की माला, गीता का गुटका, खडाऊं और दक्षिणा देकर ब्राहमण से प्रसन्न होने और पैर छूकर आर्शीवाद लेते थे। लेकिन अब लोग बाजार से तैयार भोजन मंगा कर खिलाते हैं। कुछ यजमान तो ऐसे हैं जो श्राद्ध कर्म कराने वाले पंडित को कुछ दक्षिणा के साथ ब्रेड, बिस्किट और चाकलेट दे रहे हैं। पुरोहितों को कुछ यजमान अब पैसा देकर भेजन कराने से फुर्सत लेने लगे हैं।

उन्होने शास्त्रों के हवाले से बताया कि श्रद्धा पूर्वक पितृ श्राद्ध की क्रिया देर तक चलती है। लम्बे समय तक कर्म काण्ड (पूजा) में बैठने के बजाय यजमान कुछ समय में अपने को फारिग होने की बात पुरोहित से कहते हैं। पूजन के बाद पिण्डदान के लिए बनी ‘पडी को लोग गाय को खिलाने के बाद जल अर्पित कर स्नान करना चाहिए लेकिन यजमान पुरोहित को ही पिण्डी देकर बिना स्नान किये वापस जाते हैं। एक अन्य तीर्थ पुरोहित राजेन्द्र पालीवाल ने बताया कि समय के साथ लोगों में पितरों के श्राद्ध के प्रति श्रद्धा और समर्पण में बदलाव आया है।

अस्सी के दशक में लोग पूरे परिवार के साथ तर्पण करने आते थे। यह समर्पण अब कम नजर आने लगा है। आधुनिकता की चकाचौंध में हमें अपनी संस्कृति, सभ्यता व संस्कारों को दरकिनार नहीं करना चाहिए। इसकी चपेट में युवा पीढ़ी ही अधिक प्रभावित हो रही है। युवा इसे पिछड़ापन और रूढ़िवादिता का नाम देते हैं। भोग विलास और आधुनिकता की चकाचौंध और ऐश्वर्य उनके जीवन उनका आदर्श बन गए हैं।  श्री पालीवाल ने कहा कि पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करना चाहिए। वे चाहे जिस योनि में हों उन्हें दु:ख नहीं मिलना चाहिए। उनकी सुख-शांति के लिए ¨पडदान तर्पण करना ही श्राद्ध की महिमा है। श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं।

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