इंडिया में मिले डायनासोर के विलुप्त होने के प्रमाण, तो चीन में मिले डायनासोर के अंडे

0
278
file photo
  • करोड़ों साल पुराने डायनासोर के अंडे मिले चीन में 

नई दिल्ली, 21 मई 2019: दक्षिण चीन में घूमने के दौरान कुछ छात्रों को लाल मिट्टी में लिपटे हुए डायनासोर के 6.5 करोड़ों साल पुराने अंडे मिले हैं। मीडिया ख़बरों के अनुसार जंगल के रास्ते होकर जाते हुए कॉलेज के 4 छात्रों को ये छह डायनासोर के अंडे नजर आएं, यह अंडे लाल मिट्टी में फंसे हुए थे। जीनजियांग प्रांत के पिंक जियान शहर में लाल मिट्टी में धंसे इन अंडो का एक वीडियो फुटेज भी जारी किया गया है।

इन्हें खोजने वाले कॉलेज के छात्रों ने कहा कि उसे देखकर पहले उन्हें लगा कि वह किसी तरह के पत्थर हैं और बाद में 5 गए तो उन्हें वो डायनासोर के अंडे लगे और उन्होंने पास के म्यूजियम में इसकी तत्त्काल सूचना दी।

बाड़मेर में मिले डायनासोर के विलुप्त होने के प्रमाण

  • जोधपुर के भू-विज्ञान विभाग की खोज

नई दिल्ली, 21 मई 2019: पृथ्वी के पूर्वी हिस्से से 6.5 करोड़ साल पहले डायनासोर सहित अन्य जीवों के विलुप्त होने का प्रमाण बाड़मेर बेसिन के फतेहगढ़ क्षेत्र में मिला है। एक अनुमान के मुताबिक बाड़मेर रागेश्वरी ज्वालामुखी में क्रिस्टेशियस-टर्शियरी (केटी) बाउंड्री के समय भयंकर विस्फोट हुआ था, जिसकी राख पृथ्वी के 10 किलोमीटर ऊपर क्षोभमंडल तक चली गई। वायुमंडल का तापमान माइनस में होने से राख संघठित होकर कांच के एक से पांच मीटर व्यास के गोलों में बदल गई। इसके बाद में ये गोले पूरे महाद्वीप पर बरसे, जिससे पूर्वी हिस्से के 90 फीसदी जीव नष्ट हो गए।

यह खोज जयनारायण विविद्यालय (जेएनवीयू) के भू-विज्ञान विभाग के प्रो. सुरेश माथुर और उनकी टीम के सदस्य डॉ. सोनल माथुर, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. श्रीधर गौड़ और शोध छात्र सौरभ माथुर ने की है। शोध भारत की भू-विज्ञान की सबसे बड़ी पत्रिका जर्नल ऑफ जियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के जनवरी 2019 के अंक में प्रकाशित हुआ है। केटी बाउंड्री के समय ही मैक्सिको में चिकलु नामक स्थान पर भारी उल्का पिंड गिरा था। इससे वहां 200 किलोमीटर बड़ा क्रेटर हो गया। इसमें धरती के पश्चिमी हिस्से के डायनासोर सहित अन्य जीव मारे गए। चिकलु में आयरन और इरिडियम के प्रमाण मिले थे। इरिडियम इंटरप्लेनेटरी धातु है, जो पृवी पर नहीं पाया जाता है।

इसकी खोज करने वाले वैज्ञानिक प्रो. एल्वारोज को नोबल पुरस्कार दिया गया। भारत, चीन, कोरिया और जापान जैसे देशों में 6.5 करोड़ वर्ष पहले आयरन व इरिडियम के प्रमाण नहीं मिले हैं। शोध में पता चला है कि रागेश्वरी ज्वालामुखी में 6.5 करोड़ वर्ष पहले हुए भयंकर विस्फोट से बहुत लावा निकला था। बाड़मेर बेसिन में तीन किलोमीटर नीचे लावे की 7800 मीटर मोटी परत है। कांच के गोले बरसने से समुद्र का तापमान बढ़ा, दूसरी तरफ प्रचंड वेग से राख वायुमंडल में होने से सूर्य की रोशनी के अभाव और ज्वालामुखी विस्फोट से उठी सुनामी में सभी जीव मारे गए थे।

जेएनवीयू के भू-विज्ञान विभाग के प्रो. सुरेश माथुर के अनुसार यह शोध पृथ्वी के पूर्वी भाग के लिए महत्वपूर्ण है। इससे कई भूवैज्ञानिक अवधारणाएं बदलेंगी। इससे दक्षिण बाड़मेर बेसिन और सांचोर बेसिन में तेल मिलने की संभावनाएं भी बलवती होंगी। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here