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    Home»इंडिया

    लखनऊ की ऐतिहासिक शान: जिसे देखने लोग आज भी दूर दूर से आते हैं

    By March 24, 2019 इंडिया 1 Comment4 Mins Read
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    सभी फोटो: शगुन न्यूज़ इंडिया डॉट कॉम
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    पक्का उर्फ लाल पुल:

    नवाब आसफ उद -दौला के वक्त राजा नवल राय ने गोमती पर एक ईमानदार पुल बनवाया जो बीच में ऊंचा और किनारों पर नीचे था। जिस पर चढ़ना उतरना खासा मुश्किल था। सवा सौ साल बाद उसी को तोड़कर और सीधा कर अंग्रेजों ने लाल पत्थरों से यह पक्का उर्फ लाल पुल बनाया। इसका उद्घाटन 1914 में वायसराय ने किया जिनके नाम पर यह हार्डिंग ब्रिज कहलाया।

    ‘टीले वाली मस्जिद’:

    लखनऊ की सबसे ऊंचा स्थान लक्ष्मण टीले पर बनी है यह ‘टीले वाली मस्जिद’। 1674 में यहीं शाह पीर मोहम्मद ने एक मदरसे और मस्जिद की नींव डाली थी। मुगल बादशाह शाहजहां ने इसे पक्का और बड़ा बनवाना शुरू किया। मगर इसे पूरा करके ‘आलमगिरी मस्जिद’ का नाम दिया औरंगजेब ने। 1857 के हमलों में अंग्रेजों ने मस्जिद को तो बख्श दिया लेकिन मदरसा मटिया मेट कर दिया गया।

    सभी फोटो: शगुन न्यूज़ इंडिया डॉट कॉम

    इमामबाड़ा:

    कहते हैं सूखे से बेहाल लोगों को राहत दिलाने को नवाब आसिफ दौला ने इमामबाड़ा बनवाया था। गरीब गुरबा इसे दिन में बनाते और बड़े घरों के लोग रात में इसे तोड़ने का काम करते थे, ताकि गरीबों को रोजी- रोटी मिलने के काम का सिलसिला चलता रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना किसी लोहे लकड़ी के धन्नी या खम्बे के इतनी बड़ी इमारत 1784 से आज तक उसी शान से खड़ी है।

    रूमी दरवाजा:

    अवधी वास्तुशिल्प का सबसे उम्दा आलीशान नमूना है 63 फुट ऊंचा और 250 फीट चौड़ाई रूमी दरवाजा, बुलंद मेहराबदार दरवाजे के अंदर तीन और विशाल दार हैं। जिनसे हौदे समेत हाथी बड़ी शान से गुजरते थे। दो तरफा अलग इसकी बनावट में एक तरफ हवा में तैरता हुआ पंचमहल दिखता है, तो दूसरी तरफ सैकड़ों झरोखे बुर्जियां, मेहराबें आठकोनी, छतरियां और सजीली नुकीली छड़ें।

    गोमती नदी:

    युगों -युगों से गोमती लक्ष्मण जी की लक्ष्मणपुरी लखना पासी के लखनपुर। मुगलों शहजादों, नवाबों के लखनौ; अंग्रेजों के लकनाओ और हम सब के लखनऊ को पालती -पोसती -सीचती हैं। कहते हैं अवध का पहला नवाब बनते ही गोमती से उछल कर दो मछलियां नवाब सआदत अली खान बुरहान उल मुल्क की गोद में आ पड़ी और तभी से अवध और लखनऊ की किस्मत चमक उठी।

    आलम गिरी मस्जिद की अजान:

    लक्ष्मण टीले से निशब्द गूंजती भाई चारे की कहानी ‘आलम गिरी मस्जिद की अजान’ में मुगल सल्तनत की वुस्वत की गूंज बड़े इमामबाड़े में नवाब आसफ उद -दौला के जमाने से गोमती मातन की सदाएं छोटे इमामबाड़ा से उठती मजलिस और मरसिया ख्वानी के धुन ब्रिटिश घंटाघर की घंटियों की झंकार सुनते हुए सिर्फ सवा किलोमीटर की सैर, सर्दियों का सफर तय कराकर राही को किसी जादुई जहाज में पहुंचा देती है।

    घंटाघर:

    221 फुट ऊंचा यह घंटाघर 1881 में अंग्रेजों ने बनाया था। इसे वास्तव में लंदन के जे डब्ल्यू बेनशन ने बनाया था। हिंदुस्तान की सबसे बड़ी चौडी घडी जिसमें मौजूद 4 सुरीली घंटियां और गनमेटल के विशाल लगभग 1000 किलो के घंटे की आवाज पूरे शहर में सुनाई देती थी। इस घंटे पर बड़ी खूबसूरती से उभरा हुआ है इसका समून इतिहास।

    बारादरी:

    बारादरी यानि कम -अज़ -कम दर्जन दरवाजों वाली आरामगाह जहां कुदरती नज़रों, शेर -ओ- शायरी, नृत्य और संगीत का आनंद लिया जाए। हुसैनाबाद की बारादरी नवाब मोहम्मद अली शाह ने बनवाई थी। बाद में अंग्रेजों ने इसे इस पर लोहे के खंभे से एक दूसरी मंजिल बनायीं। धीरे-धीरे यह अवध के नवाबों की तस्वीरों की पिक्चर गैलरी बन गयी।

    सतखंडा:

    लखनऊ को बेबीलॉन बनाने के सपने के साथ शुरू किया गया था। आसमान तक उड़ान भरने वाला यह सतखंडा बुर्ज। कहते हैं कि क़ुतुब की छै और इटली की पीसा मीनार की 8 मंजिलों से बढ़कर इस में 9 मंजिले बननी थी। पर 1842 में नवाब मोहम्मद अली शाह की मृत्यु के साथ उनका सतखंडा सपना सिर्फ चौ खंडा बनकर अधूरा रह गया।

    छोटा इमामबाड़ा:

    अपनी सजावट, खूबसूरती, सुनहरे गुंबद, नहर, बागों, ताजमहल की तर्ज पर बने मकबरों, संगमरमरी मस्जिद, अतिशदानों कंदीलों, शमादानों के लिए मशहूर है छोटा इमामबाड़ा। बेल्जियम से फर्श और छत के लिए लाए गए कांच के रंग बिरंगे, झूमर, झाड़ फानूस 1842 में भी लाखों की कीमत के थे, और नवाब मोहम्मद अली शाह के लिए हुसैनाबाद से बेशकीमती कुछ भी नहीं था।

    जामा मस्जिद:

    नवाब मोहम्मद अली शाह ने अट्ठारह सौ चालीस के जामा मस्जिद की न्यू रखी थी। उनकी बेगम मलका ए फाक सहाबा और मलका जहां सहाबा में से पहले उन्हें ज्यादा प्यारी थी। मगर उनमें दूसरी ज्यादा आज्ञाकारी थी। नवाब साहब की मृत्यु होने के बाद पश्चात अपने पति के हिस्से के पैसों से अपने पति का सपना पूरा किया और लखनऊ को तीन शलगमी गुम्बदों वाली आलीशान दे दी।

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    1 Comment

    1. website on February 11, 2025 2:35 am

      I needed to thank you for this wonderful read!!
      I definitely enjoyed every bit of it. I have got you book-marked
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