नवेद शिकोह: देश जब सुबह सो कर उठा तो उसे ख़बर मिली कि देश की बेटी ख़ाक हो गई। हमें खबर ही नहीं हुई और ये दुखियारी बेटी रात दो से तीन के दरम्यान जला दी गई। जलती बेटी की आग की लपटों की ख़ामोश तस्वीर देखकर अफसोस हुआ। सब बेखबर रहे और वो ख़ाक़ हो गई।
जबकि आज के वैज्ञानिक युग में कितना सब कुछ आसान हो गया है। ख़ासकर आज के दौर की एंडवास इम्फारमेशन टैक्नोलॉजी हमें सारी ख़बरें दे देती है। लेकिन दुर्भाग्य कि एक लड़की ख़ाक हो गई लेकिन हमें उसपर हुए जुल्म से जुड़ी कई पुष्ट ख़बरें नहीं मिलीं।
जैसे-
ये लड़की देश की बेटी थी या दलित की बेटी !
अगर वो दलित की नहीं देश की बेटी थी तो देश के कुछ लोग बेटी की हत्या के विरोध का विरोध क्यों कर रहे हैं। आज की निर्भया के सामूहिक बलात्कार और हत्या पर दुख व्यक्त करने और इस जुल्म का विरोध करने वालों को कुछ लोग गिद्ध क्यों कह रहे हैं !
कुछ लोग कह रहे हैं कि राजस्थान में भी रेप हुआ था। उसका विरोध कम हुआ था, तो हाथरस वाले रेप पर ज्यादा अफसोस ज़ाहिर करने का क्या मतलब !
हाथरस घटना पर तमाम सवाल उठना शुरू ही हुए तो जल्दबाजी मे इस बेटी को खाक क्यों कर दिया गया !
रेप और हत्या के दौरान उसपर क्या-क्या ज़ुल्म हुए थे! रीढ़ की हड्डी कैसे टूटी ! इस तरह के सवाल हो रहे हैं कि रेपिस्ट फलां जाति-धर्म का था तो कम विरोध हुआ था तो फिर इस रेप पर ज्यादा विरोध क्यों !
सचमुच, बिना धार्मिक विधिविधान के एक बेटी की जलती लाश की तरह हम, हमारी सरकारों का कर्तव्य,हमारी प्राशासनिक व्यवस्था, हमारी मानवता, हमारे संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारियां ख़ाक होती जा रही हैं। और हम बेख़बर हैं।







