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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    अव्यवहारिक धरातल पर आंदोलन

    ShagunBy ShagunDecember 15, 2020 Current Issues 1 Comment3 Mins Read
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    Post Views: 534

    आपकी बात : डॉ राकेश कुमार मिश्र

    इस समय यह मांग आंदोलनकारियों की ज़ुबान पर है कि सरकार एम एस पी को कानून का रुप क्यों नहीं दे देती। किसान नेतृत्व के साथ साथ विपक्षी नेताओं एवं बुद्धिजीवियों द्वारा भी विषय को बिना समझे एवं उसके परिणामों का बिना आंकलन किए सस्ती लोकप्रियता के लिए इस अव्यावहारिक मांग को तूल दिया जा रहा है। एम एस पी की घोषणा विशुद्ध रूप से सरकार की एक प्रशासनिक एवं प्रोत्साहन मूलक नीति रही है और हर फसल पर इसकी अनुशंसा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग करता है। सरकार निजी क्षेत्र में उत्पादित किसी वस्तु की कानूनी तौर पर कीमत निर्धारित कर लोगों को इस बात के लिए मजबूर नहीं कर सकती वे उसी कीमत पर या अधिक पर खरीदें अन्यथा दंड के भागीदार बनें।

    सरकार अपनी जरुरत की खरीद के लिए तो निश्चित न्यूनतम मूल्य की गारन्टी दे सकती है परन्तु निजी क्षेत्र को बाध्य नहीं कर सकती है। अर्थव्यवस्था का संतुलन बाजार तंत्र एवं मांग पूर्ति की शक्तियों पर निर्भर करता है न कि सरकार द्वारा लाए गए तुगलकी फरमानों से। कभी आपने सोचा कि यदि निजी क्षेत्र बाजार से अधिक कीमत के दबाव में खरीद से हाथ खींच लेता है या कम कर देता है तो इसका खामियाजा किसानों के साथ साथ पूरे देश को भुगतना होगा या फिर सरकार आगे आकर सम्पूर्ण अधिशेष खरीदे। इसके लिए सरकार को 15 लाख करोड़ रुपये लगभग व्यय करने होंगे जबकि सरकार की राजस्व प्राप्तियां 16.5 लाख करोड़ रुपये के आस पास है।

    स्वाभाविक है कि सरकार सब कुछ ताक पर रखकर ऐसा नहीं कर सकती। बाजार से अधिक समर्थन मूल्य निर्यात में भी दिक्कत उत्पन्न करता है। भारत में गेहूँ का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1960 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि अन्तर राष्ट्रीय बाजार में यह 1400 रुपये के आस पास है। फलस्वरूप सरकार को गेहूँ निर्यातकों को 600 रुपये प्रति क्विंटल सब्सिडी देनी पड़ती है। यह निर्विवाद है कि समर्थन मूल्य जैसी प्रोत्साहित करने वाली नीतियों से आर्थिक संसाधनों के वितरण पर गलत प्रभाव पड़ता है।

    पंजाब में तराई क्षेत्र न होने पर भी धान की बड़े पैमाने पर खेती इसका उदाहरण है। पंजाब में फसल का 85 प्रतिशत तक समर्थन मूल्य पर बिक जाने के कारण वहाँ का किसान धान एवं गेहूँ का ही अधिकतम उत्पादन करता है। फसलों के विविधीकरण की दिशा में समर्थ होने के बावजूद वह पूर्णतया उदासीन है। पंजाब आज इन्हीं कारणों से निम्न उत्पादकता एवं गिरते भू जल स्तर की मार झेल रहा है जिसका अधिकतम खामियाजा लघु एवं सीमान्त कृषकों को उठाना पड़ रहा है जो उतने सम्पन्न नहीं हैं। कहने का तात्पर्य है कि मोदी विरोध में हमें ऐसी मांगो को बल नहीं देना चाहिए जो अपने एवं देश के लिए आत्मघाती हों।

    Shagun

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    1 Comment

    1. Milda Villanueva on December 16, 2020 12:18 pm

      i like this recommended post

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