एक शहादत ने लाखों जिन्दगियां बचा लीं 

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नवेद शिकोह
लखनऊ, 06 दिसम्बर 2018: एक बड़ी साजिश का शक यक़ीन की तरफ बढ़ रहा है। कल्पना कीजिए गांव के गांव भड़का दिये जाते। भोले-भाले ग्रामीणों को बहकाकर उत्पाती उनके साथ दूसरे समुदाय के जलसे की लाखों की भीड़ के आमने-सामने आ जाते तो क्या होता !  कुछ ही वक्त में बुलंदशहर श्मशान और कब्रिस्तान में तब्दील हो सकता था। देशभर में दंगों की आग फैल सकती थी। दरोगा सुबोध कुमार सिंह साजिश का जहर खुद पीकर अपनी जान पर नहीं खेलता तो सैकड़ों की मौत का खेल कोई ताकत नहीं रोक पाती।
सुबोध कुमार भारत मां के सपूत थे। हिंसा की काट शांति के संदेश से देने वाले सनातनधर्म के सिद्धांतों का पालन करने वाले सुबोध हिन्दुओं की आन-मान और शान का प्रतीक थे। उन्होंने बार्डर पर लड़ने वाले सैनिक से भी बड़ी कुर्बानी दे दी। सीमा पर सैनिक देश के दुश्मनों से लड़ता है। उसे पड़ोसी देश के सैनिकों और औतंकवादियों के नापाक इरादों और उनकी ताकत का अंदाजा होता है। इंस्पेक्टर सुबोध तो अपने क्षेत्र की जनता की हिफाजत की ड्यूटी को अंजाम दे रहे थे।
कानून व्यवस्था की रक्षा की जिम्मेदारी निभा रहे थे। उन्हें क्या पता था कि जिनकी रक्षा में वो दिनों-दिन की पुलिस की नौकरी कर रहे हैं वो लोग ही भीड़ की शक्ल में उन्हें बेदर्दी से मार डालेंगे। गांव की भोली-भाली जनता के बीच इलाके के कट्टरपंथी संगठनों के इरादों की पहले ही खबर होती तो सुरक्षा बढ़ा दिया जाता। सेना बुलवा ली जाती। लेकिन किसको पता था कि गन्ने के खेतों के इर्द-गिर्द बसे गांवों में साजिशों की इतनी जबरदस्त फसल पक रही है।
हांलाकि दर्दनाक हिंसा वाले इन गांवों से करीब पचास किलोमीटर दूर मुस्लिम समुदाय की भारी भीड़ वाले कार्यक्रम (इज्तिमा) के मद्देनजर खुफिया तंत्र को कम से कम नजदीकी क्षेत्रों /गांवों की खुफिया रिपोर्ट हासिल कर लेनी चाहिए थी। घटना के दौरान ना सिर्फ पुलिस पर हमला बल्कि थाने और वाहनों को आग के हवाले करने वाली भीड़ के पास तरह- तरह के हथियार देखने को मिले थे। पुलिस पर हमलावर लोग बाकायदा फायरिंग कर रहे थे। धारदार हथियार और लाठी डंडे लिए उत्पात मचाने वाली भीड़ एकाएकी हथियारों के साथ इकट्ठा कैसे हो गई ? संगठनों के पदाधिकारियों के नामजद होने के बाद ये शक यकीन की तरफ बढ़ रहा है कि सब कुछ सुनियोजित था।
पुलिसकर्मियों पर हमला नहीं बल्कि लाखों की संख्या में इज्तिमा में एकत्र दूसरे समुदाय के लोगों से टकराव की साजिश यदि कामयाब हो जाती तो अंदाजा लगाइये क्या होता! एक तरह एक समुदाय के लाखों लोग और दूसरी तरफ तमाम गांवों के दूसरे समुदाय के लाखों लोग।
दरोगा सुबोध सिंह ने आंख पर गोली खायी और ये गोली उनके सिर से पार हो गये। वो शहीद हो गये और लाखों लोगों के टकराव से देश में दंगो की आग लगाने वाली साजिश नाकाम कर गये।
पुलिस का शेर सिपाही सुबोध सिंह कानून व्यवस्था और इंसानों की रक्षा का कर्तव्य निभाने के लिए दूरदर्शी निगाहें और तेज दिमाग रखते थे। जिस आंख पर लगी गोली जिस दिमाग से पार हो गयी थी वो आंख और दिमाग  इज्तिमा में इकट्ठा भीड़ के मद्देनजर किसी भी साजिश को कामयाब नहीं होने देना चाहता था। इसलिए वो साजिश का जहर पीकर शहीद हो गये और लाखों की भीड़ में दंगे की आग के शोलों से उन्होंने देश को बचा लिया।

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