- बर्निंग Issue: नवेद शिकोह
मैं भी उनको पत्रकार नहीं मानता लेकिन देश की बड़ी तादाद उसे आइडियल पत्रकार मान रही है। इस सच को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। किसी के हीरो को गाली नहीं दी जा सकती। आलोचना और प्रशंसा का हक हर किसी को है। लेकिन लोकतंत्र में जनसमर्थन का थोड़ा ख्याल तो रखना ही होगा। विरोध और अपमान के अंतर को समझ कर ही हम आलोचनात्मक टिप्पणी करें तो बेहतर होगा।
मैंने इमानदारी और निष्पक्ष पत्रकारिता के चक्कर में मुफलिसी में ज़िन्दगी काट दी। पत्रकारिता के सिद्धांतों की बेड़ियों ने तरक्की के रास्तों पर चलने नहीं दिया। पत्रकारिता संतुलन सिखाती है और ये भी बताती है कि किसी भी नजरिये को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते।
अरुधंति राय और गौरी लंकेश को देश का एक तब्का महान लेखिका मानता रहा और दूसरा वर्ग कहता है कि ये लोग एक धर्म विशेष विरोधी और देश की गद्दार है।
इन दो दीवाने तबकों की भावनाओं और तर्कों के बीच रहकर ही कोई समझदार शख्स बात करेगा। हम दूसरे को अंधभक्त कहने का तब ही हक़ रख सकते हैं जब हम अपनी दोनों आंखे खुली रखें। नहीं एक उधर का अंधभक्त हो जायेगा और एक इधर का अंध भक्त हो जायेगा। बीच के संतुलित और निष्पक्ष नजरिये वाले नहीं होंगे तो सचमुच देश बर्बाद हो जायेगा।
ये कैसे मुम्किन है कि कोई भाजपा की आईटी सेल की नफरत की बातों पर तो एतराज करे लेकिन कांग्रेस किसी इंसान(भले ही वो बुरा हो) को कुत्ते की शक्ल में पेश करे तो हम तालियां बजायें। जब हम एक तरफा नजरिये के किसी पत्रकार को भड़वा और दलाल कहने का हक रखते हैं तो हम खुद बतौर पत्रकार एकतरफा नजरिया कैसे रख सकते हैं !!!







