पत्रकार क़ादरी को ब्रेन स्ट्रोक, साम्प्रदायिक सौहार्द खतरे से बाहर

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लखनऊ, 02 दिसंबर, 2019: एकाएक बहुत कुछ बदल गया था। सामान्य मौसम रुख्सत हो रहा था। नवंबर गुजरते ही सर्द हवाओं ने जाड़े की दस्तक दे दी थी। शाम तक पत्रकार अलीम क़ादरी पूरी तरह से तंदुरुस्त थे। शाम ढलते ही जबरदस्त ब्रेन हैमरेज के बाद उनकी ज़िन्दगी सिसकियां लेने लगी। क़ादरी के नजदीक खड़ी मौत को खदेड़ने की कोशिश तेज़ हो गई थी। सिसकती ज़िन्दगी को उम्मीदों की सासें मिलने लगीं।

इस कोशिश ने समाज में फैली मज़हबी नफरत की बीमारी को भी सेहतयाब करने की मिसाल दे दी।
‘साहसी भारत’ पत्रिका के पत्रकार अलीम क़ादरी को वेंटीलेटर दिलवाने के कठिन संघर्ष में बीमार पड़े साम्प्रदायिक सौहार्द को भी आक्सीजन मिल गया।

नफरत फैलाने के इल्जाम के जख्म से घायल मीडिया को भी मरहम मिलता दिखा। संगठनबाजी की सियासत में फूट और खुदगर्जी का शिकार लखनऊ के पत्रकार बुरे वक्त पर एक दूसरे के काम भी नहीं आते। गैर मान्यता प्राप्त और मान्यता प्राप्त पत्रकारों के बीच खाई है.. ! लखनऊ में पत्रकारिता के इन अंधेरों को आशा की एक किरण दिखाई देने लगी।

ब्रेन स्ट्रोक के बाद की हालत देखकर लग रहा था कि कादरी को मौत के अंधेरों से कोई नहीं बचा सकता। इस पत्रकार की हालत देखकर लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल के डाक्टरों ने वापस कर दिया। इतने में शीबू निगम नाम के एक युवा पत्रकार वहां जिन्दगी का फरिश्ता बनकर आये और क़ादरी को बचाने की कोशिश में बीमार पड़े साम्प्रदायिक सौहार्द, भाईचारे और गंगा जमुनी तहजीब को भी सेहतयाब कर गये।

शीबू ने अपने पैसे से प्राइवेट एम्बुलेंस की और बलरामपुर अस्पताल से केजीएमयू के ट्रामा सेंटर ले गये। मौलाना जैसी हुलिया (गैटअप)वाले पत्रकार अलीम क़ादरी को कुछ मित्र प्यार से मौलाना भी कहते हैं। इस मौलाना पत्रकार की जान बचाने की कोशिश में शीबू अकेले लड़ रहे था। यमराज से अपने पति को बचाने वाली सावित्री की तरह इलाज पाने की हर मुश्किल से वो लगे थे।

शीबू जानते थे कि यदि वैंटीलेटर नहीं मिला तो कादरी की सांसे थम सकती हैं। अकेले जानिबे मंजिल दौड़ते-दौड़ते वो घबरा सा गये थे कि कुछ ही मिनटों में उनके जैसे मददगार पत्रकारों का कारवां बनता गया। केजीएमयू में वैंटीलएटर हासिल करने के संघर्ष में बराबर का साथ देने के लिए शीबू निगम के साथ अजय वर्मा संजोग और हेमंत कृष्णा जैसे तमाम पत्रकार कादरी को वैंटीलएटर दिलाने में कामयाब हो गये। सोशल मीडिया पर ये वाकिया वायरल हुआ तो कलकत्ता से दो सौ किलो मीटर आगे एक भव्य मंदिर में दर्शन के लिए गये लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिश्रा ये मामला जानकर बेचैन हो गये।

उन्होने कुछ देर के लिए दर्शन का कार्यक्रम स्थगित किया। फोन पर कादरी की तबियत की पल-पल की जानकारी लेते रहे। देखरेख में लगे पत्रकार संजोग से आर्थिक सहयोग स्वीकार पंहुचाने का आग्रह किया। इसी तरह तमाम मान्यता प्राप्त और गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया। और ये सिलसिला जारी है।

पत्रकार अलीम क़ादरी अभी तक खतरे से बाहर तो नहीं है लेकिन गंगा-जमुनी तहज़ीब के शहर लखनऊ के इन पत्रकारों ने मौजूदा दौर में बीमार पड़े साम्प्रदायिक सौहार्द को खतरे से बाहर होने की दलील दे दी।

नवेद शिकोह

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