अच्छी सेहत चाहते हैं तो सप्ताह में एक बार स्मार्टफोन से रहें दूर!

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नई दिल्ली, 07 जून 2019: देश में सूचना एवं प्रौद्योगिकी की लत खतरनाक दर से बढ़ रही है। भारत में लगभग तीन वयस्क उपभोक्ता लगातार एक साथ एक से अधिक उपकरणों का उपयोग करते हैं और अपने 90 प्रतिशत कार्यदिवस उपकरणों के साथ बातचीत करते हुए बिताते हैं। यह तय एक अध्ययन में सामने आया है। इस तंय पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है कि स्क्रीन पर जरूरत से ज्यादा समय बिताने से मानसिक और शारीरिक दोनों तरह के नुकसान हो सकते हैं।


बचाव के कुछ टिप्स:

  • सप्ताह में एक बार एक पूरे दिन सोशल मीडिया से बचें।
  • सोने से 30 मिनट पहले किसी भी इलेक्ट्रनिक गैजेट का उपयोग न करें।
  • हर तीन महीने में 7 दिन के लिए फेसबुक प्रयोग न करें।

    अध्ययन के निष्कर्ष :

अध्ययन ने यह भी संकेत दिया कि 50 फीसद उपभोक्ताओं के मोबाइल पर गतिविधि शुरू करने के बाद फिर कंप्यूटर पर शुरू हो जाते हैं और भारत में इस तरह स्क्रीन स्विच करना आम बात है। मोबाइल फोन का लंबे समय तक उपयोग गर्दन में दर्द, आंखों में सूखेपन, कंप्यूटर विजन सिंड्रोम और अनिद्रा का कारण बन सकता है। 20 से 30 वर्ष आयु के लगभग 60 फीसद युवाओं को अपना मोबाइल फोन खोने की आशंका रहती है, जिसे नोमोफोबिया कहा जाता है।

एर्क्‍सपट्स की नजर में :

एचसीएफआई के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. केके अग्रवाल ने कहा, हमारे फोन और कंप्यूटर पर आने वाले नोटिफिकेशन, कंपन और अन्य अलर्ट हमें लगातार उनकी ओर देखने के लिए मजबूर करते हैं। यह उसी तरह के तंत्रिका मागरे को ट्रिगर करने जैसा होता है जैसा किसी शिकारी द्वारा एक आसन्न हमले के दौरान या कुछ खतरे का सामना करने पर होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा मस्तिष्क लगातार सक्रिय और सतर्क रहता है, लेकिन असामान्य तरह से। हम लगातार उस गतिविधि की तलाश करते हैं, और इसके अभाव में बेचैन, उत्तेजित और अकेला महसूस करते हैं। कभी-कभी हाथ से पकड़ी स्क्रीन पर नीचे देखने या लैपटप का उपयोग करते समय गर्दन को बाहर निकालने से रीढ़ पर बहुत दबाव पड़ता है। हम प्रतिदिन विभिन्न उपकरणों पर जितने घंटे बिताते हैं, वह हमें गर्दन, कंधे, पीठ, कोहनी, कलाई और अंगूठे के लंबे और पुराने दर्द सहित कई समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाता है।

यह भी :

मैक्स कैथलैब के निदेशक डॉ. विवेका कुमार के अनुसार गैजेट्स के माध्यम से सूचनाओं की इतनी अलग-अलग धाराओं तक पहुंच पाना मस्तिष्क के ग्रे मैटर डेंसिटी को कम करता है, जो पहचानने और भावनात्मक नियंतण्रके लिए जिम्मेदार है। इस डिजिटल युग में, अच्छे स्वास्य की कुंजी है मडरेशन, यानी तकनीक का समझदारी से उपयोग होना चाहिए। हम में से अधिकांश उन उपकरणों के गुलाम बन गए हैं, जो वास्तव में हमें मुक्त करने और जीवन का अनुभव करने और लोगों के साथ रहने के लिए अधिक समय देने के लिए बने थे। हम अपने बच्चों को भी उसी रास्ते पर ले जा रहे हैं।

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