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आस्था या प्रदूषण को बढ़ावा ?

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यह कैसी आस्था है जिसे देखकर भी सब अनजान है। कल इसी जल को पीने को विवश होंगे हमारे बच्चे और हम समाज के लोग, तो फिर खतरनाक प्रदूषण से इस पृथ्वी की प्रकृति को कौन बचाएगा…ज़रा सोचो और समझो।

एक समाजसेवी का कहना है कि यदि विसर्जन करना ही है तो जहाँ पंडाल बनाया गया वहां एक छोटा सा अस्थायी तालाब की तरह टैंक बना लें, और इको फ्रेंडली गणेश जी को उसमें विसर्जित करें।

जब मूर्ति की मिटटी पानी में पूरी तरह से घुल जाये तो उस पवित्र पानी को हर गमले में या फिर पार्क के पेंड पौधे में डाल दें और अन्य विसर्जित सामग्री वहीँ मिटटी में नीचे गड्ढा खोदकर दबा दें।

इससे हम अपनी प्रकृति की रक्षा कर सकते हैं।

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