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    Home»इंडिया

    विदेश नीति की प्रगति का प्रमाण

    By May 22, 2019 इंडिया 2 Comments4 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    कुछ समय पहले तक यह कल्पना भी मुश्किल थी कि भारत को उत्तर अटलांटिक संधि अर्थात नाटो  के सहयोगी सदस्य का दर्जा  देने का प्रस्ताव किया जाएगा। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन अर्थात नाटो का निर्माण शीतयुद्ध के दौर में हुआ था। तब भारत को सोवियत संघ का करीबी माना जाता था। ऐसे में भारत की नाटो से दूर रहना स्वभाविक था। अब समय बदल चुका है। पिछले करीब पांच वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हुई है। इस अवधि में भारत आतंकवाद, विदेशों में जमा होने वाले अवैध धन, आर्थिक भगोड़ा, पर्यावरण, सौर ऊर्जा आदि से संबंधित विषयों को प्रमुखता से उठाता रहा है। इन मुद्दों को व्यापक समर्थन भी मिला है। भारत के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने सर्वसम्मति से  अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मान्यता प्रदान की। इन तथ्यों का प्रभाव नाटो पर भी पड़ा। नाटो के अनेक देश चाहते है कि भारत को सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा।
    अमेरिकी कांग्रेस में इससे संबंधित विधेयक रखा गया है। अनेक सांसदों ने प्रस्ताव का समर्थन किया है। इसके पारित होने के बाद भारत के नाटो का सहयोगी सदस्य बनने का रास्ता साफ हो जाएगा। अमेरिका का विदेश मंत्रालय भारत को नाटो का सहयोगी सदस्य नामित करेगा। इस प्रस्ताव के साथ भारत व अमेरिका के संबंधों पर जो कहा गया , वह भी उल्लेखनीय है। इसमें कहा गया कि अमेरिका और भारत की रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना आवश्यक है।
    नाटो की स्थापना सैन्य आधार पर हुई थी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ने तब ऐलान किया था कि नाटो के किसी एक सदस्य के ऊपर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जायेगा, और फिर उसी के अनुसार हमले का जबाब दिया जाएगा। अब अमेरिका का कहना है कि  भारत उंसकी रक्षा प्राथमिकता में है। यह विधेयक  सांसद जो विल्सन ने पेश किया है। वह विदेश संबन्ध समिति के प्रभावशाली सदस्य है। विधेयक में कहा गया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और क्षेत्र में स्थिरता का अहम स्तंभ है।
    निर्यात नियंत्रण की नीतियों पर हमेशा प्रतिबद्धता दिखाई है। अमेरिकी कानून में यह संशोधन भारत प्रशांत क्षेत्र में आपसी साझेदारी और सुरक्षा प्रतिबद्धता को मजबूत करेगा। भारत रणनीतिक साझेदारी ग्रुप ने इस विधेयक को अपना समर्थन दिया है। अमेरिकी कांग्रेस में सर्वाधिक समय तक सदस्य रहे भारतीय मूल के  एमी बेरा, हाउस इंडिया ग्रुप के उपाध्यक्ष जॉर्ज होल्डिंग, ब्रैड शेरमैन, तुलसी गबार्ड और टेड योहो ने भी इस विधेयक को पारित करने की अपील की है।
    राष्ट्रीय सुरक्षा एक्ट उन्नीस सौ सत्रह में भारत को  अमेरिका के प्रमुख रक्षा सहयोगी का दर्जा दिया गया था। इसमें भी भारत के साथ व्यापार और तकनीक साझा करने पर विशेष सहयोग और प्राथमिकता देने की बात कही गई थी। विधेयक की पृष्ठिभूमि में यह माना गया कि भारत व अमेरिकी संबंधों  को ऊंचा मुकाम मिला है। दोनों की  रक्षा साझेदारी भविष्य में आगे बढ़ती रहेगी। इसके पहले इजरायल, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और जापान की तरह नाटो का सहयोगी सदस्य बनाया गया था। ये सभी विश्व के महत्वपूर्व व विकसित देश है। अब इनमें भारत का नाम भी जुड़ जाएगा।
    इसके लिए हथियार निर्यात एक्ट में संशोधन किया जाएगा। कांग्रेस में प्रस्तुत विधेयक का यही उद्देश्य है।  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप बदल गया था। ब्रिटिश साम्राज्य से सूर्य अस्त होने लगे थे।अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्ति के रूप में स्थापित हुए थे। दोनों के बीच सीधा टकराव तो नहीं था, लेकिन अपनी अपनी खेमेबंदी अवश्य थी। अमेरिका की पहल पर नाटो बना। वह चाहता था कि यूरोप के देश कम्युनिस्ट खेमे से प्रभावित न हों। नाटो की स्‍थापना चार अप्रैल उन्नीस सौ उनचास में हुई थी। इसका मुख्यालय वेल्जिम के ब्रुसेल्स में है। यह एक सैन्य संगठन है।
    कोरियाई युद्ध के समय अमरीकी सर्वोच्च कमांडरों के दिशानिर्देशन में एकीकृत सैन्य कमांड स्थापित की गई थी। इस प्रकार इस संगठन ने अपने सैन्य स्वरूप को मजबूत बनाया था। सोवियत संघ के बिखराव, जर्मनी के एकीकरण से इस संगठन की सदस्य संख्या बढ़ी। वारसा संधि में सोवियत संघ खेमे के देश थे। अमेरिका, ब्रिटेन,बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्राँस, आइसलैंड, इटली, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, इसके संस्थापक सदस्य थे। स्थापना के चार वर्ष बाद ग्रीस एवं तुर्की नाटो के सदस्य बने इसके बाद जर्मनी, स्पेन, चेक गणराज्य, हंगरी एवं पोलैंड,  बुल्गारिया, एस्टोनिया, लाटविया, लिथुआनिया, रोमानिया, स्लोवाकिया एवं स्लोवेनिया अल्बानिया एवं क्रोएशिया, मोंटेनेग्रो व मैसिडोनिया नाटो में शामिल हुए। इसकी वर्तमान संख्या तीस हो गई है। जाहिर है कि यह संगठन शीतयुद्ध के समय भी महत्वपूर्ण था। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद भी इसने अपनी प्रासंगिकता बनाये रखी। अनेक महत्वपूर्ण देशों को इसमें सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। यह उम्मीद है कि भारत भी निकट भविष्य में नाटो का सहयोगी सदस्य बन जायेगा। इन सभी देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधो का भी विस्तार होगा।

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