भगवान किधर हैं!

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इबादत की सियासत में फोटोग्राफर खुदा होता है 
नवेद शिकोह
लखनऊ, 19 मई 2019: लोकतंत्र में सबसे ऊंचा शिखर प्रधानमंत्री का पद है। पहाड़ों की सबसे ऊंची चोटी छूने के लिए संघर्ष करना होता है। हेलीकॉप्टर ऐसे संघर्ष का विकल्प होता है। सत्ता के शिखर तक पंहुचने के संघर्ष का विकल्प मीडिया होता है। मीडिया की सुर्खियां और फुटेज पाने के भी शॉटकट स्टंट होते हैं। ऐसे हुनर और मीडिया मैंनेजमेंट का सलीखा आता हो तो सियासत के लिए मीडिया भगवान साबित होता है। या यूं कहिये कि मीडिया भगवान या खुदा से भी बढ़ कर होता है। भक्त बन कर नेता जब भगवान की आराधना में मग्न होता है और मीडिया फोटोग्राफर आ जाता है तो नेता ध्यान जारी रखता है लेकिन भगवान की तरफ पीठ और फोटोग्राफर की तरफ चेहरा कर लेता है।
  धारणा है कि भगवान की आराधना या खुदा की इबादत पूरी एकाग्रता से की जाये तो आराधना/इबादत सफल हो जाती है। लेकिन इबादत की सियासत में मीडिया का विघ्न जरूरी है। इबादत की सियासत में आराधना करने में जब तक मीडिया विघ्न ना डाले जब तक इबादत अपने मकसद में कामयाब नहीं होगी।
वैसे ही जैसे कुछ मीटू वाले विश्वामित्र शायद इस मकसद से ही तपस्या में लीन होते हैं कि कोई मेनका जैसी अप्सरा उनकी तपस्या भंग करने आ जाये।
इबादत की सियासत में खामोश गुफा की तपस्या में एकाग्रता जरूरी हो सकती है। लेकिन एकाग्रता को तोड़ने वाले मीडिया के कैमरों का फ्लैश चमकना बेहद जरूरी है।
यानी मीटू वाले इसलिए तपस्या में लीन होते हैं कि कोई अप्सरा आकर उनकी तपस्या भंग करे। ऐसे सी राहुल बाबा चुनाव में मंदिरों के चक्कर काटते हैं। नरेंद्र मोदी भगवान की आराधना करने गुफा में चले जाते हैं। दोनों की सियासी इबादत में भगवान नदारद हो जाते होंगे। क्योंकि वहां सियासत का भगवान मीडिया मौजूद होती है। जो धर्म को लेकर धावुक जनता को बताती है कि फलां नेता भगवान का आराध्य है। जनता खुश हो जाती है और वोटों का वरदान देती है।
और फिर ऐसे लोकतांत्रिक देशों को भगवान भी नहीं बचा पाता।
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