‘हंसना’ मन का ‘टाॅनिक’ है तो रोना उपचार की मुश्किल दवा!

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हंसना मन का ‘टाॅनिक’  है, तो रोना इसके उपचार की मुश्किल दवा! इसके लिए थोड़ी कोशिश करनी होती है, लेकिन मन का मैल धोने का यह सहज मार्ग है.
हम शरीर की चिंता को जितनी गंभीरता से लेते हैं, उतना ही ख्याल क्या हम मन का भी रखते हैं! यह सवाल इस समय सबसे अधिक प्रासंगिक है. पिछले दस बरस में अमेरिका जापान, रूस के साथ भारत में भी मानसिक रोग, परेशानी, उदासी गहराती जा रही है. विज्ञान, तकनीकी प्रयोग के लिए दुनिया भर में मशहूर जापान अब मानवीय प्रबंधन की ओर अधिक संवेदनशील होने का प्रयास कर रहा है. जापान में लोगों से अपने कामकाज और निजी जीवन के बीच संतुलन पर सबसे अधिक बल दिया जा रहा है.
सामुदायिक जीवन बेहतर करने के साथ कुछ ऐसे प्रयोग हो रहे हैं जिन्हें सरल भाषा में ‘क्राइंग थेरेपी’ कहा जा सकता है. इसमें व्यक्ति के साथ ही समूह को इस बात के लिए तैयार किया जा रहा है कि वह अपने दुखों को पूरी तरह से व्यक्त कर पाए. जीभर के रो ले. रोना हमारी बहुत कुशल उपचार पद्धति है. अपनी अज्ञानता, अहंकार के कारण इसे केवल स्त्रियों से जोड़कर देखा जाता है. अब तक हमारे देश में बहुत से लोग यह कहते मिल जाते हैं कि क्यों महिलाओं की तरह रो रहे हैं! जबकि रोना अपना ही उपचार स्वयं कर लेने जैसा है. मन में जमा हुआ मैल रो लेने पर बहुत हद तक धुल जाता है.
हम हंसने पर बहुत अधिक बल देते हैं, कोशिश करते रहते हैं. लाफ्टर क्लब और टीवी पर रात-दिन हल्ला मचाते लाफिंग शो हमारे हंसी की ओर रुझान को दिखाने वाले हैं. अगर हंसना मन का ‘टाॅनिक’  है, तो रोना उपचार की मुश्किल दवा! इसके लिए थोड़ी कोशिश करनी होती है, लेकिन मन का मैल धोने का यह सहज मार्ग है.
एक छोटा-सा किस्सा आपको सुनाता चलता हूं. मेरेे पास देर रात मुखर्जी नगर से फोन आया. मेरे अज़ीज मित्र के छोटे भाई का. वह कुछ वर्ष तक एक निजी कंपनी में नौकरी करने के बाद आईएएस की तैयारी कर रहा है. उसकी आवाज में कुछ परेशानी, दुविधा थी. उसने कहा, घर की बहुत याद आ रही है. मन पढ़ाई में नहीं लग रहा. मैंने कहा तुरंत घर आ जाओ! अभी इसी वक्त! उसने कहा रात को ही. कल सुबह आ जाऊं. मैंने कहा, नहीं, अभी आना होगा! क्योंकि तुम्हारा मन बहुत अधिक परेशान, नकारात्मक विचार से घिरा हुआ है. ओला करके चुपचाप चले आओ! अभी. दो घंटे बाद वह नजर के सामने था. गरमागरम दाल-चावल और देसी स्वाद के बीच उसने मन की अनेक परतें खोलकर रख दीं.   ‌‌‌
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उसने कहा, आपने अभी बुलाकर बहुत अच्छा किया. कई महीने से टालने के कारण मन में ऐसी चीज़ों का मैल जम गया था, जिन पर मेरा नियंत्रण तो नहीं है, लेकिन उसकी कड़वाहट मन में लगातार तैर रही थी. मैंने उससे बस इतना ही कहा, अपने मन का भी ऐसे ही ख्याल  रखो, जैसेेे शरीर का रखते हो. मन को अकेला नहीं छोड़ना है, उसके अकेला पड़ते ही, हम भीतर सेेे कमजोर होने लगते हैं. हमें पता ही नहीं चलता, कब हमारा मन हमारे नियंत्रण से परे हो जाता है.
मन पर सजग दृष्टि बहुत जरूरी है. उसे भी वैसे ही प्रेम की दरकार है, जैसे शरीर को होती है. शरीर तो अक्सर डॉक्टर के पास रहता है, लेकिन अब हमें तनाव निराशा और उदासी के बढ़ते हुए असर को देखते हुए मन को भी उसके ‘चिकित्सक’ के पास ले जाने केे बारे में सहजता से सोचना होगा! अगर आपके पास भी कोई अपना, किसी अपने का कोई अपना, कभी कोई पीड़ा लेकर आना चाहे तो उसे कभी मत टालिए. न जाने वह कितने गंभीर संकट में आपको याद कर रहा है, आपके पास आना चाह रहा है!

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