युद्ध लड़े तो जा सकते हैं, लेकिन जीते नहीं जा सकते?

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5 सितम्बर: सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन के जन्म दिवस शिक्षक दिवस पर

5 सितम्बर को प्रत्येक बच्चे के चरित्र निर्माण के संकल्प के साथ सारे देश में पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन का जन्म दिवस ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में बड़े ही उल्लासपूर्ण एवं शैक्षिक वातावरण में मनाया जाता है। वह एक महान शिक्षक, विद्वान दार्शनिक तथा भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ व्याख्याकार थे। एक आदर्श शिक्षक के रूप में उनकी उपलब्धियों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। एक शिक्षक के रूप में मैं अपने 60 वर्षों के शैक्षिक अनुभव को इस लेख के माध्यम से परम आदरणीय सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन जी को शत शत नमन करते हुए सभी देशवासियों से शिक्षक दिवस के महान अवसर पर साझा कर रहा हूँ।

शिक्षा राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ताकत हैं, इस बात को स्वीकार करते हुए हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी देश के प्रत्येक बच्चे को देश की महान संस्कृति एवं सभ्यता के साथ ही विश्वस्तरीय ज्ञान देने के लिए देश में ‘नई शिक्षा नीति’ लागू करने जा रहे हैं। आने वाले समय में हम सभी देखेंगे कि शिक्षा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार के साथ देश ने विश्वस्तरीय शिक्षा में नई ऊंचाइयाँ प्राप्त कर ली है।

हमारा मानना है कि ‘युद्ध के विचार सबसे पहले मनुष्य के मस्तिष्क में पैदा होते हैं अतः दुनियाँ से युद्धों को समाप्त करने के लिये मनुष्य के मस्तिष्क में ही शान्ति के विचार उत्पन्न करने होंगे।’ शान्ति के ऐसे विचार देने के लिए मनुष्य की सबसे श्रेष्ठ अवस्था बचपन ही है। विश्व एकता, विश्व शान्ति एवं वसुधैव कुटुम्बकम् के विचारों को बचपन से ही घर के शिक्षक माता-पिता द्वारा तथा स्कूल के शिक्षक द्वारा प्रत्येक बालक-बालिका को ग्रहण कराने की आवश्यकता है ताकि आज के ये बच्चे कल बड़े होकर सभी की खुशहाली एवं उन्नति के लिए संलग्न रहते हुए ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ अर्थात ‘सारी वसुधा एक कुटुम्ब के समान है’ के संकल्प को साकार करेंगे।

वैसे तो तीनों स्कूलों पहला परिवार, दूसरा समाज तथा तीसरा विद्यालय के अच्छे-बुरे वातावरण का प्रभाव बालक के कोमल मन पर पड़ता है। लेकिन इन तीनों में से सबसे ज्यादा प्रभाव बालक के जीवन निर्माण में विद्यालय का पड़ता है। बालक बाल्यावस्था में सर्वाधिक सक्रिय समय स्कूल में देता है। दूसरे बालक विद्यालय में ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा लेकर ही आता है। यदि किसी स्कूल में भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक तीनों गुणों से ओतप्रोत एक भी टीचर आ जाता है तो वह स्कूल के वातावरण को बदल देता है और बालक के जीवन में प्रकाश भर देता है। वह टीचर बच्चों को इतना पवित्र, महान तथा चरित्रवान बना देता हैं कि ये बच्चे आगे चलकर सारे समाज, राष्ट्र व विश्व को एक नई दिशा देने की क्षमता से युक्त हो जाते हैं।

स्कूल चार दीवारों वाला एक ऐसा भवन है जिसमें कल का भविष्य छिपा है। मनुष्य तथा मानव जाति का भाग्य क्लास रूम में गढ़ा जाता है। प्रत्येक बालक को बचपन से ही परिवार, स्कूल तथा समाज में ऐसा वातावरण मिलना चाहिए जिसमें वह अपने हृदय में इस सर्वभौमिक सच्चाई को आत्मसात् कर सके कि ईश्वर एक है, धर्म एक है तथा मानवता एक है। ईश्वर ने ही सारी सृष्टि को बनाया है। ईश्वर सारे जगत से बिना किसी भेदभाव के प्रेम करता है। अतः हमारा धर्म (कर्तव्य) भी यही है कि हम बिना किसी भेदभाव के सारी मानव जाति से प्रेम कर सारे विश्व में आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना करें।

महात्मा गांधी ने कहा था कि मैं महापुरूषों के बनाये ठीक उसी रास्ते पर नहीं चलूँगा। अर्थात मैं महापुरूषों के विचारों से तो प्रेरणा लूंगा लेकिन जैसे कार्य उन्होंने किये उसी लकीर पर मैं नहीं चलूंगा। मैंने महात्मा गांधी तथा विश्व के अन्य महापुरूषों के विचारों से प्रेरणा लेकर विश्व एकता की अपनी राह स्वयं निर्मित की है। नेलसन मण्डेला ने कहा था कि शिक्षा विश्व का सबसे शक्तिशाली हथियार है जिससे विश्व में सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है। महात्मा गांधी ने यह भी कहा था कि यदि हम वास्तव में विश्व को शान्ति की सीख देना चाहते हैं तथा यदि हम युद्ध के खिलाफ वास्तविक युद्ध करना चाहते हैं तो इसकी शुरूआत हमें बच्चों की शिक्षा से करनी होगी। पाऊलो फेररी ने कहा था – शिक्षा लोगों को बदलती है और लोग दुनिया को बदलते हैं।

हम मात्र पिछले 100 वर्षों के इतिहास को देखे तो यह एक सच्चाई है कि प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक की समाप्ति बाद विश्व शान्ति के लिए लींग आॅफ नेशनस की स्थापना हुई थी। द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 तक लड़ा गया था। विश्व के लगभग 70 देशों की थल-जल-वायु सेनाएँ इस युद्ध में सम्मिलित थीं। इस युद्ध में विश्व दो भागों मे बँटा हुआ था – मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र। 6 अगस्त तथा 9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा तथा नागाशाकी में दो परमाणु बम गिराकर बड़ा नरसंहार किया था। उसके बाद 24 अक्टूबर 1945 को इस विश्व युद्ध की विभीषका से घबरा कर संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी। अमेरिका द्वारा पहली बार दो परमाणु बमों का इस्तेमाल जापान के खिलाफ किया गया था। लाखों बेकसूर लोगों की हत्या तथा घूट-घूट कर मारने के इस जघन्य अपराध के लिए अमेरिका ने विश्व समुदाय से आज तक कभी माफी नहीं मांगी। विश्व के पास अपना कोई प्रभावशाली विश्व न्यायालय न होने के कारण अमेरिका जैसे सबसे बड़े अपराधी को कोई सजा भी नहीं दी जा सकी।

प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्धों को रोकने तथा विश्व में शान्ति की स्थापना के लिए अमेरिका के तत्कालीन दो राष्ट्रपतियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। अब हमें यह इंतजार नहीं करना है कि तृतीय विश्व युद्ध होने के  बाद हम विश्व सरकार गठन कर लेंगे। हमें यह जानना चाहिए कि संभावित तृतीय विश्व युद्ध की आये दिन परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हंै यदि तृतीय विश्व युद्ध घटित हुआ तो बड़े-बड़े परमाणु बमों तथा घातक मिसाइलों से लड़ा जायेगा। जिसमें सारी धरती और उसमें पलने वाले जीवन का पूरी तरह से विनाश हो जायेगा, इस विनाश के परिणामों की मानव जाति कल्पना भी नहीं कर सकती। लाखों वर्षों से संजोई यह सुन्दर धरती धूली कण बनकर अनन्त ब्रह्माण्ड में कहीं विलीन हो जायेगी।

परमाणु हथियारों व संहारक मिसाइलों के इस युग में युद्ध लड़े तो जा सकते हैं, किन्तु जीते नहीं जा सकते? मानव जाति के समक्ष बस वसुधैव कुटुम्बकम् को विश्व संस्कृति के रूप में अपनाकर ‘जय जगत’ के उद्घोष को साकार करने का विकल्प बचा है। न्याय के तराजू के एक पलड़े में विश्व शान्ति तथा दूसरे पलड़े में विश्व युद्ध के सुखद तथा दुखद दृश्य हमारे समक्ष हैं। मानव जाति को सही चुनाव करने में विश्वव्यापी दृष्टिकोण तथा विश्वव्यापी समझदारी का परिचय समय रहते देना है। आगे हमारा सुझाव है कि भारत को अपने विभिन्न देशांे में स्थित दूतावासों के माध्यम से अपनी संस्कृति, सभ्यता तथा संविधान में निहित वसुधैव कुटुम्बकम् तथा विश्व एकता के विचारों का पूरी शक्ति के साथ प्रचार-प्रसार पूरे विश्व में करना चाहिए।

आज देशों को चलाने के लिए अपनी-अपनी चुनी हुई संसद तथा अपना संविधान है लेकिन विश्व को चलाने के लिए उसकी कोई चुनी हुई संसद तथा विश्व का संविधान नहीं है। विश्व की शान्ति की सबसे बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्ति प्रदान कर विश्व संसद का स्वरूप दिया जाना चाहिए। आधुनिक तकनीक तथा उन्नत संचार माध्यमों ने अब विश्व को एक ‘ग्लोबल विलेज’ का स्वरूप प्रदान किया है। हम सभी इस ‘ग्लोबल विलेज’ के विश्व नागरिक हैं।

भारत को ऐसे कदम उठाने चाहिए जिससे विश्व भर के मानव संसाधन को मानव जाति के कल्याण में अधिक से अधिक लगाया जा सके। विश्व के सभी देश के लोग अपने-अपने देश से तो प्यार करते हंै लेकिन वैसा ही प्यार अपनी सुन्दर धरती से नहीं करते हैं। यह सारा विश्व पराया नहीं है यह इसमें वास करने वाले प्रत्येक विश्ववासी का अपना ही है। विश्व सुरक्षित रहेगा तो इसमें स्थित सभी देश भी सुरक्षित रहेंगे। विश्व हमें देता है सब कुछ – हम भी तो कुछ देना सीखें। आइये, शिक्षक दिवस के इस महान अवसर पर हम भारत सहित विश्व के 2.5 करोड़ बच्चों को सुरक्षित भविष्य प्रदान करने हेतु यथाशक्ति योगदान देने का संकल्प लें।

डा. जगदीश गांधी

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