या देवी सर्वेभूतेसु शक्तिरूपेण संहस्थिता,
नोमो त्यसैइ- नोमो त्यसैइ नामो नामः
हमारे देश में नवरात्रि का त्यौहार बड़े धूम-धाम से मनाये जाने की परम्परा है। इस 9 दिनों तक मनाये जाने वाला भरतीय परम्पराओं को जीवित रखने वाली यह त्यौहार भारतीयों की अनूठी सांस्कृतिक एवं आस्थाओं की जीवन्त उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नौ दिनों तक मनाये जाने के बाद नवरात्रि के आख़िरी दिन विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है । जहां तक हमारे रामायण के अलावा अन्य ग्रन्थों के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था इसलिए इस दिन को विजयदशमी के रूप में मनाये जाने की परम्परा है। वहीं दूसरी तरफ वेदों में वर्णित व्याख्या के अनुसार सत्य युग मे यानिकि रामचंद्र जी के जन्म से पूर्व वैसे तो युगों को चार भागों में बंटा गया है प्रथम – सत्य युग, दूसरा-त्रेता युग तीसरा द्वापरयुग चथुर्थ युग- कली युग जो आज के समय चल रहा है।
इस पृथ्वी पर न जाने कितने ही बार एक के बाद एक इन चार युगों के खण्ड के दौर से गुजर चुके होंगे भगवान राम का जन्म त्रेता युग मे हुआ था। सत्य युग मे सब कुछ सत्य यानिकि अपनी मूलभूत अवस्था मे ही हुआ करता था। इसका अर्थ झूठ या असत्य नाम की कुछ भी नही था इस युग मे भगवान ने इस प्रकृति में इंसान के रूप में देवताओं (सुर) और असुर ( जो कि सुर न हो ) इन दो पुत्रों की उत्तपत्ति की जिसका उल्लेख हमारे धर्म ग्रंथो में पाया जाता है।

भगवान प्रदत्य इन दो पुत्रों के मध्य इस पृथ्वी में एक लम्बे समय तक जीवित रहने की महत्वाकांक्षा के जाग्रत होने पर अमृत पान करने (अर्थात अ-नही मृत्य- नाश) की इच्छाओं के वशीभूत हो कर इसे प्राप्त करने के लिए इन दोनों भाइयों अर्थात सुर एवं असुरों के मध्य संग्राम हुआ था यह हम सभी लोगों को ज्ञात है। इससे भी पूर्व काल मे “महिसासुर” नामक एक राक्षस हुआ जिसकी अतीताइयों से अजीज आये सुरों ने अत्यंत परेशान हो भगवान विष्णु को अपनी व्यथा सुनाई इस राक्षस की ज्यादतियों को सुन भगवान विष्णु सब को लेकर ब्रह्ममा जी के पास पहुंचे ब्रह्ममा जी ने कहा कि हम दोनो मिलकर भी इस राक्षस को समाप्त नही कर सकतें हैं अतः भगवन शंकर ही इससे हम सबको छुटकारा दिलवा सकते हैं ऐसा विचार कर देवगण अंत मे भगवान शंकर के पास पहुँचे इन तीनों देवताओं के सम्मिलित क्रोध से एक कन्या का आविर्भाव हुआ इस कन्या का नाम दुर्गा रखा गया ।
कन्या के जन्म लेते ही दुर्गा ने भगवान से पूछा कि हे देव मेरे उत्पन्न होने का प्रयोजन एवं कार्य बताइये इस पर इन तीनो देवों ने अपने -अपने अस्त्र उस कन्या को देते हुए राक्षस महिसासुर के वध करने के लिए उस कन्या यानिकि दुर्गा से कहा इस पर कन्या ने पूछा हे भगवान आप तीनो में से एक ही इस राक्षस का वध करने के लिये पर्याप्त है तो मेरी आवश्यकता का कारण क्या है इस पर भगवान ब्रह्ममा ने कहा कि पुत्री इस राक्षस का वध करना इतना सहज नही है कियुंकि इसे वरदान प्राप्त है कि इसकी मृत्युं केवल कन्या के हाथों से ही होगी। यह सुन कर माँ दुर्गा अपने पिताओं से आशीर्वाद ले महिसासुर को युद्ध के लिए ललकारने निकल पड़ी।
स्वर्ग का स्थान जहाँ पर सभी देवता लोग ही निवास करते थे यह स्थान हिमालय के गोद मे इस्थित है इससे कुछ दूर यानिकि “नरक” जहां हिमालय की चोटियों से निकल कर झरने का जल निरन्तर बहती रहती है वही लोक नरक लोक है। ( जो पूर्व काल मे हिमायल के तलहटी का क्षेत्र हुआ करता था। (आज भी हमें पहाड़ के निवासियों के मुहँ से यह सुनने को मिलता है कि ‘नीचे को’ या फिर ‘ऊपर को’ जान है।) ऊपर यानिकि स्वर्ग – जहाँ धूल, मिट्टी, ताप, रहित निर्मल वायु औषधि वनस्पतियों से परिपूर्ण स्थान नर्क – जहाँ इन सभी अवस्थाओं के विपरित स्थान को कहते हैं। चूंकि देवी दुर्गा का जन्म इस पहाड़ी क्षेत्र में हुआ इसलिए आज भी यहाँ के लोगों में देवी दुर्गा का पूजन बड़े धूम-धम से मनाया जाता है।) पहाड़ के कंदरा में छिपे बैठे महिसासुर दुर्गा के रूप से मोहित हो कर बाहर निकल कर मां दुर्गा को कुदृष्टि से देखने पर दोनों के मध्य नौ (9) दिनों तक युद्ध हुआ। इन नौ (9) दिनों में देवी के नौ रूप हुए माता दुर्गा के 9 रूपों के नाम हैं – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। दुर्गा और महिसासुर राक्षस के मध्य चले इस युद्ध की विभीषिका को इस तरह हम समझ सकते हैं कि मां दुर्गा लड़ते-लड़ते अपनी होशोहवास खो चुकी थी।
भूख-प्यास से समस्त शरीर काली पड़ गई मारे तृष्णा के वह युद्धभूमि में लड़ रहे नर के मुंडो को उखाड़ कर उसके बहते रक्त से अपनी प्यास बुझाने लगी दुर्गे की इस अवस्था के रूप को काली के रूप में हम जानते एवं पूजा अर्चना करते हैं। काली की दूसरी अवस्था मे जब दुर्गा जी लड़ते-लड़ते रणचंडी के रूप में आने पर रुकने का नाम ही नही ले रही थी पृथ्वी पर प्रलय होने लगा ऐसे में सभी देवगण भयभीत हो कर भगवान शंकर के पास पहुँचे और उनसे देवी को रोकने की प्रार्थना करने लगे इस पर भगवान शंकर उस रणभूमि के मध्य जा कर लेट गये।
उन्मादी रणचंडी काली के रूप में लड़ते हुये उनका ध्यान रण भूमि के मध्य लेटेे हुए भागवान शंकर पर नही पड़ा और अचानक लड़ते-लड़ते उनका एक पैर शंकर के ह्रदयस्थल पर रख दिया इस पर माँ काली को अपराध बोध के आभास होते ही उनका जीभ बाहर निकल आया। दुर्गा के इस रूप को हम मां काली के रूप में आज भी पूजा-अर्चना करते हैं। नवरात्रि का त्यौहार प्रतिवर्ष 5 बार मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीने में नवरात्रि त्यौहार को ‘वसंत नवरात्रि’ के रुप में मनाया जाता है जो आधुनिक युग के कैलेंडर के अनुसार मार्च के महीने में पड़ता है। वसंत नवरात्रि के नौवें दिन को हम राम नवमी के रुप में मनाते हैं।
ठीक इसी प्रकार जून जुलाई के महीने में ‘गुप्त नवरात्रि’ मनाया जाता है। इस दिन को ‘गायत्री नवरात्रि’ के रूप में भी जाने का प्रचलन है। अक्टूबर और नवंबर के महीने में ‘शारदीय नवरात्रि’ मनाया जाता है जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार अश्विन महीने में मनाया जाता है।
उत्तरभारत के लोग विशेषतः रामनवमी को रामचंद्र जी के रावण को मार कर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में दसवें दिन विजयदशमी के रूप में मनये जाने का प्रचलन है। इस तरह बुराई पर अच्छे की जीत के उपलक्ष्य में हमारे भारत मे इस तरह के त्यौहार को मना कर समाज को एक विशेष संदेश देने की परिपाटी वर्षों से हमारे यहाँ चली आ रही है।
– जी के चक्रवर्ती







